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नज़दीकियाँ!


नज़दीकियाँ आज़ कल थोड़ी दुर हैं रहती,
कुछ आदतें जो इन दिनॊं मज़बूर हैं रहती,


अधुरे एहसासॊं के लम्हे इकट्ठे होते हैं
बैचेनियाँ ये कुछ रोज़ मसरूफ़ हैं रहती,


उनके पास जाने के तमाम रस्ते हैं,
ख्वाबॊं में पर कहाँ असल बात है रहती








सीधी बात होती नहीं सो कहे देते हैं,
कह दिये फ़िर सीधी बात नहीं रहती

फ़ांसले नापने से युँ कम नहीं होते,
युँ ही अपनी आँखे नम नहीं रहतीं! 




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