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धीरे धीरे ... और खत्म?

 आप धीरे धीरे खत्म होते जाते हैं,
अगर आप सफ़र को नहीं जाते हैं,
अगर आप कुछ बांचते नहीं,
ज़िंदगी को उसकी आवाजों से भांजते नहीं,
आईनों में अपनी तस्वीर को मांजते नहीं

 आप धीरे धीरे अंत हो जाते हैं,
जब आप अपनी मान्यता मारते हैं
अपनी तरफ़ बड़े हाथों को नकारते हैं,

आप धीरे धीरे खत्म हो जाते हैं,
अगर आप आदतों से अपने को बांधते हैं,
रोज वही लकीर पीटते हैं - रोज के सधे हुए दिन को साधते हैं,
अगर आप नये रंगो को नहीं पहनते,
किसी नये को नहीं चीनते,


आप धीरे धीरे काफ़ूर हुए जाते हैं,
अगर आप दीवानेपन से कतराते हैं,
और उसकी रवानगी से,
जो आपकी आँखों को नम करती है,
दिल की धड़कनों को चरम करती है,

 आप धीरे धीरे नासूर हुए जाते हैं
अगर आप अपनी ज़िंदगी नहीं बदलते
उस वक्त ज़ब आपको,
आपका काम नहीं चलता,
रिश्ते में दिल नहीं पलता और
आपको अपना माहौल नहीं फ़लता

अगर आप अपनी यकीनी को जोखिम नही सिखाते,
उसके लिये जिसका कोई ठिकाना नहीं,
अगर आप किसी सपने का साथ नहीं देते,
अगर आप ज़िंदगी में कम से कम एक बार,
अपने को ये इज़ाज़त नहीं देते,
कि भाग खड़ॆ हो
नेक नसीहतों से
- पाब्लो नरूड़ा

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