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एक दो तीन. . . चौदह,पन्दरह

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बचपन के तेरह, अल्हड़पन के पांच
जवानी के छह – आठ
और दीवानगी के पन्द्रह
कभी सोचा था ?
दीवानगी सबसे काबिल साबित होगी !
हाथ होगी , साथ रहेगी ,
मुश्किलो की बात रहेगी,
और मुश्किलो को मात रहेगी
एक उम्र पीछे छोड दी ,
बचपन, अल्हड़्पन और जवानी ,
नहीं कह सकते , हार मान गये ,
पर ये जरुर भान गये , जान गये ,
दाल कभी कभी गल सकती है ,
जल सकती है,
पर पल नहीं सकती
या फिर युँ कहिये,
कि सब ने अपनी जगह ढ़ुंढ ली ,
बचपन आता है , टोह लेने ,
खेल जाता है, तु - तु, मैं -मैं,
अड़ जाता है कभी जिद्द् पे ,
जाओ कट्टी!
निराश होने कि बात नहीं ,
जवानी भी तो ताक लगाये बैठी है 
मन ही मन कहती है ,
मिठ्ठी -मिठ्ठी"
अल्हड़्पन भी कुछ कम नहीं सताता ,
अपनी धुन में आ जाये तो उसे कुछ नहीं भाता ,
मुँह फ़ुला, और कुछ नहीं बताता ,
चॆहरे के सामने पीठ होती है ,
ये उमर ही ऐसी ढ़ीट होती है ,
और चंचल ,
पाँच मिनिट एक युग होता है ,
समय हाथ से फ़िसलता होता है ,
नज़र फ़िसली , द्र्श्य बदला ,
हाँफ़ते - हाँफ़ते जवानी सामने खडी होती है
कब से ताक लगाये बैठी थी कंधे के उपर से
झांकते, आतुर , मुस्तैद , तैयार,
और एक दिन सुबह सुबह , अधखुली आँखो पर
आइना दस्तक देता है ,
और खुद से नज़र मिलती है ,
आसमान हिलता है , धरती फ़टती है ,
ज़वानी में सारी दुनिया बदलती है 
अपनी खुशी पहाड़ लगती है ,
अपनी मुश्किलें समंदर ,
घर से भाग जाने का मन क्योँ करता है"
(कुणाल कपुर , विज़ेता में)
और अचानक जब आप को यकीन होने लगता है,
कि दुनिया आपकी दुश्मन है ,
एक सपना सामने आता है 
बहकाता है, बहलाता है ,
जो कभी नहीं  कही - सुनी ,
वो बातें कहलाता है ,
लमहो के बीच फ़ांसला बड़ जाता है ,
ऐसा तो कभी नहीं हुआ ,
खुद से ज्यादा जरुरी , कोई और?
ये कब , कैसे हो गया ,
दीवाने हो गये हॊ क्या ?
दीवानगी मुबारक हो!
अब मज़ा आयेगा खेल का ,
आप कहेंगे , फंस गये!
पर जिंदगी नौ रस है ,
अगर आपको एक ही बस है ?,
तो, या तो ये बीमारी है , या नशा,
ये न तो खुशियो का पड़ाव है,
न मुश्किलो का सफ़र,
ये रवैया है, 'Attitude'
मुश्किलो के साथ खड़े होकर,
मुस्कराने का , गाने का ,
पिया बसंती रे . . . काहे सताये आ जा. . .”
या फ़िर
"ईना, मीना, ड़ीका. . .”
और सब से बड़ा सच तो ये ,
कि एक दिन सब जायेगा , माया है , नश्वर,
और अगर आप कल के भरोसे बैठे हैं 
तो दीवानगी आप के बस की बात नहीं ,
आज़ ही कितना बड़ा है ,
मैं जरा 'अब' हो लुं ,
"अपुन बोला, तु मेरी लैला ,
वो बोली फ़ैंकता है साला "

टिप्पणियाँ

  1. हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये बधाई के साथ शुभकामनायें ।

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