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काले सच

सुरज की गर्मी से जल कर
काले बादल सफ़ेद हो गये,
सच के मान्यताओं से मतभेद हो गये
हर चीज़ जल कर राख नहीं होती
मिट्टी में मिलने से दुनिया खाक नहीं होती
सारी शैतानियां लाख नहीं होती
लाख कोशिशें दिमाग की, यकीं बिना
दिल पर छायी धुँध साफ़ नहीं होती,


पेड़ आसमान छू रहे हैं,
और पंछी फ़िर भी, लाख कोशिश,

दूरियां कम नहीं होती, 
अब इसे उड़ान कहें, या 
सोच की थकान,
आप कहां पहुंचेंगे, कब होंगे,
दूरियों के उस ओर, ये
इस बात से तय होगा कि 
आप अपने रास्तों से चल रहे हैं
या अपने रास्तों में पल रहे हैं,
तस्वीर आपकी नज़र है, या, 
हर अंजाने मोड़ पर आप हाथ मल रहे हैं,
प्रक्रिति की दीवारें, कल से, काल से सीधी खड़ी हैं, 
अपने पैरों तले बहती,
नदी को छोटा करते, पर 
जब ढहती हैं, तो ऐसे बहती हैं
जैसे यही सत्य है,
खोना ही होना है, एक
अगर आप अब भी खड़े है,
क्योंकि घुटनों में बल है,
तो सोच लीजिये, क्या
ये छल है?
जो सच है
वो घुटनों के बल है! 



(सुरज की आंकाक्षा और बादलों के खुलेपन, विनम्र नदिओं के इरादे और खिसकती पहाड़ीयों कि तपस्या से रचित)

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