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क्या समझें!

नाइंसाफ़ी है, 
दुनिया में काफ़ी है, 
बिखरते सपने, 
टूटते इरादे, और, 
खुद से ही वादे, 
कुछ आँसू, 
कुछ मुस्कानें, 
थॊड़ी मायूसी, 
फ़िर भी ज़ीना कम नहीं करते, 
हर दिन एक ज़ंग है, 
और वो जीत रहे हैं, 
खाली हाथ!
(आभा का एथेंस, ग्रिस से संदेश जहाँ वो रिफ़्युज़ी केंप मे काम कर रही थीं, - ........so many stories of struggle and individual trimuphs, smiling faces of young people.... some frustrated.....some crying...but stull winning at the everyday game of life in some way....so f'ing unfair...


क्या समझें?
कोई घर है, 
और कितने बेघर, 
बेदर, 
कोई मुसाफ़िर, 
समंदर किनारे, 
तंबू घर में रात गुजारे, 
और कई मेज़बान, 
दिल खोल, 
कहते हैं, 
"मी कासा इज़ तू कासा"*
क्या नहीं है ये इंसनियत कि भाषा?
हम सीख  रहे हैं या भूल रहे हैं?

बोल रहे हैं कितने पर, 
कितने दरवाज़े खोल रहे हैं?

(...so many people have to go through this....can't make sense of this. There are some people sleeping in tents on the beach. And some strangers have allowed me in their homes over and over again...)



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