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हम तुम

गुम हैं,
कभी खुद में,
कभी तुम में,
कभी हम में,


हम हैं,
कभी साथ,
कभी अकेले,
कभी साथ अकेले,

तुम हो,
कभी साथ,
कभी अकेले,
कभी तुम,

प्यार है,         इश्क भी,           और मोहब्बत
इक़रार भी,    कभी अश्क़,        कभी बंदगी
तक़रार भी,    कभी रश्क़।        कभी बगावत
सरसवार भी,  कभी फ़रहत       दिलअज़ीज़ आदत                            (bliss)

गम हैं,
ख़ुशी भी,
शिकायत भी,
शरारत भी

ज़ख्म हैं,
दवा है,
दर्द भी, और
दुआ भी

नज़दीकी,
कभी रूमानी,
कभी रूहानी,
कभी बेमानी

हामी,
कभी इनकार,
कभी तक़रार,
कभी इसरार

मानी,
कभी मनमानी,
कभी बेमानी,
कभी नानी😊

दूरी,
कभी खुद से,
कभी तुमसे,
कभी अनबन से

रास्ते
कभी अपने
कभी सपने
कभी चखने


मोड़,
कभी बहकाते
कभी बहलाते
कभी संभलाते

दोनों की अलग
फ़ितरत, हर
आदत, साथ
क़यामत

दोनों की एक
सोच, साथ की
दुनिया हालात की
तमाम ताल्लुक़ात की

दोनों अकेले,
दुनियादारी के,
चारदीवारी के
मज़हबी बीमारी के

20 साल,          20 साल,               20 साल
कोई शक,          कभी ख़ामोशी,       कभी रास्ता,
कोई सवाल,       कभी धमाल।         कभी सफ़र
कोई मलाल?      कभी हलाल            ख़ासा असर

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2026 वही पुराना नया साल!

नया साल आया है, लेकर वहीं पुराना सवाल आया है? मणिपुर, गाजा, सूडान, का ख़्याल आया है, देहरादून में त्रिपुरा की हत्या का बवाल आया है, सेंगर के बलात्कार का नया हाल आया है? वोट चोरी का क्या कोई निकाल आया है? उमर की बेल को कोई मिसाल आया है? जज साहेब बिके हुए हैं, सत्ता नरभक्षी है, कलेक्टर सारे डरे हुए हैं, विपक्षी अपनी गद्दियों में धंसे हुए है, पत्रकार सब दरबारी बने हुए हैं, सरकार के इश्तहार बने हुए हैं! आप और हम बॉटल में सड़ता अचार हुए हैं! हिंदुत्व का चरम है, और इसका कैसा मर्म है? मुसलमान इंसान नहीं? दलित का कोई संज्ञान नहीं? औरत इज्ज़त है, लूटने वाला सामान! नहीं? झूठ का बोलबाला हो, सच जैसे भुलावा हो, तारीख़ बदली जाएगी, भगवा इबारत आएगी, बाकी रंग शहीद होंगे, राम के सारे ईद होंगे! फिर भी साल मुबारक हो, देखिए वह जो पसंद हैं, धागा किसी का हो, आपकी पतंग है! अच्छा है इतनी उमंग है, सबका अपना ढंग है, अपनी अपनी पसंद है, हम (मैं भी) क्या करें, जो करोड़ की मुट्ठी तंग है, कपड़े उनके पैबंद हैं, सारे फीके रंग हैं! मुबारक 2026 मुबारक

साफ बात!

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सांसे गुनाह हैं  सपने गुनाह हैं,। इस दौर में सारे अपने गुनाह हैं।। मणिपुर गुनाह है, गाजा गुनाह है, जमीर हो थोड़ा तो जीना गुनाह है! अज़मत गुनाह है, अकीदत गुनाह है, मेरे नहीं, तो आप हर शक्ल गुनाह हैं! ज़हन वहां है,(गाज़ा) कदम जा नहीं रहे, यारब मेरी ये अदनी मजबूरियां गुनाह हैं! कबूल है हमको कि हम गुनहगार हैं, आराम से घर बैठे ये कहना गुनाह है!  दिमाग चला रहा है दिल का कारखाना, बोले तो गुनहगार ओ खामोशी गुनाह है, जब भी जहां भी मासूम मरते हैं, उन सब दौर में ख़ुदा होना गुनाह है!