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जश्न-ए-गुलामी!


चलो गुलामी के जशन बनाएँ
वही ठीक है जो होता आया है,
स्थिरता कितनी अच्छी चीज़ है,
सब कुछ वही....!
सही!
ज़माना खराब है, नयी चीज़
क्या भरोसा?
आज़ादी?
बाप रे बाप!
आज़ाद खयालात?
यानी, सारी मुसीबतों की जड़!

छूट जायेगी, बनायी है जो पकड़,
बचपन से अब तक,
कितनी मेहनत से,
भावनओं में जकड़
आश्रित बनाया है,
पालन-पोषण का यही
सरमाया है,
जी जान से किया है
अपने पैरों पर खड़ा, उम्र लग गयी,
भरने में खाली था घड़ा!
कहते हैं, सोच को खुलने दो
ख़बरदार, वर्षों की मेहनत
मिट्टी में घुलने दो?
आखिर कुछ सोच-समझकर ही
सब कुछ “तय” है!
दुनिया चल रही है, क्योंकि
दिलों में भय है!
आज़ाद हुए खयालात, तो
डर भूल जायेंगे
कड़वे सच,
व्यवस्था के ठेकेदार
कहाँ पचा पायेंगे, बात
बढ़ जायेगी, जंग
छिड़ जायेगी, और हम
अमन पसंद हैं
नाक-बंद कर लेंगे, अगर
सामने गंद है, दुनिया जैसी है,
वैसी ही रहने दो,
कुछ आजाद खयालात,
गुमशुदा होने दो, अच्छा है!
जो “त्याग” करना, संस्कृति की शान है,
दो पल शांत , सर झुकाएं
चलो!
गुलामी का जश्न मनायें!

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