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सच सुबह!

सब खुश हैं,
अपनी अपनी जगह पर
अपनी अपनी जगह से,
फ़िलहाल, इस पल में
और फिर
सब बदल जायेगा
और फिर
भी
सब खुश हैं,
अपनी अपनी जगह पर
अपनी अपनी जगह से
सूरज बादल आसमान जमीं
सारा निसर्ग,
सब साथ हैं,
अपनी अपनी जगह भी,
और उस के साथ बदलते
न अटके हैं , न भटके हैं
न कोई चिन्ता है,
न कोई इंसिक्युरिटी,
न खींच-तान,
न अपनी जगह का दबदबा,
पानी पानी, हवा हवा
सब चल रहा है,
सब बदल रहा है,
बदलने की कोशिश नहीं,
क्योंकि बदलना ही ज़िन्दगी है,
कोशिश तब जब डर हो,
अगर मगर हो,
खम्बों में घर हो,
और ये गुमाँ कि कुछ मेरा है,
"मैं" मालिक,
कितनी इंसानों जैसी बात है,
आप ही कहिए,
इंसान होना कौन बड़ी बात है!??






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