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हमारी दुनिया_दारी, दुकानदारी!

हमारी दुनिया,

हमारे लोग

हमारा घर

हमारा परिवार

हमारे साथी

हमारा समुदाय

हमारी दुनिया



मेरा घर  तुम्हारा घर

मेरे लोग तुम्हारे लोग

मेरा परिवार तुम्हारा परिवार

मेरे साथी तुम्हारे साथी

मेरे बच्चे तुम्हारे बच्चे

मेरी औरतें तुम्हारी औरतें

मेरी इज्जत तुम्हारी इज्जत

मेरा समुदाय तुम्हारा समुदाय

मेरी ताकत तुम्हारी कमजोरी

तुम्हारी ताकत मेरी कमजोरी



मेरी बंदूक तुम्हारी बंदूक

मेरी लड़ाई मेरी जीत

तुम्हारी हार मेरी जीत  

तुम्हारी जीत मेरी हार 

तुम्हारा नुकसान मेरा फायदा

मेरा नुकसान तुम्हारा फायदा

तुम्हारी बर्बादी, मेरी ...?

मेरी जीत?

मेरी जीत मेरी हार!



बिखरा समुदाय

टूटे घर

भूखे पेट

अनाथ बच्चे

कैसा परिवार ?

मैं बर्बाद तुम बर्बाद

कौन आबाद ?

मेरी लड़ाई तुम्हारी लड़ाई

किसकी कमाई ?

मेरा पैसा तुम्हारा पैसा

किसके पास ?



मेरी भूख तुम्हारी भूख

मेरे दर्द तुम्हारे दर्द

मैं चुप तुम खामोश

खामोशी में हम

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हमारी ज़िंदगी

हमारा परिवार

हमारे बच्चे 

हमारी दुनिया !

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हिम्मत के हथियार चाहिए नफरत नहीं प्यार चाहिए अपने हाथों में हो अपनी कश्ती की पतवार , हिम्मत के हथिया र, हिम्मत के हथियार.... कौन कहे किस को बेगाना , मजहब किसने समझा जाना मंदिर मस्जिद की बातों में, नफरत से इंकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... कब तक हम बर्दाश्त करेंगे, मासूमों पर वार सहेंगे दिल में अपने प्यार जगा दे, अब ऐसी ललकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... अपने सबको ही प्यारे हैं , बीच में कौन से दीवारें हैं गुलशन हरसू फूल खिला दें, ऐसे कारोबार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको सबका साथ चाहिए, हर झगडे की मात चाहिए नेक इरादों के मौसम से, ये दुनिया आबाद हिम्मत के हथियार , हिम्मत के हथियार.... सबके दिल में आस चाहिए , उमींदों की प्यास चाहिये मौसम बदलेंगे जब बदलें, मौसम के आसार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हक की सारी बात चाहिए नहीं कोई खैरात चाहिए, चलिए बनें संविधान के ऐसे पहरेदार, हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको खबर ए यार चाहिए दोस्ती भाईचार चाहिए रि...

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हमारी बैसाखियां

  ताकत बैसाखी है, हमको लगता है  ताकत की ही झांकी है, बचपन से ही,  हमारे बड़े, घर के बड़े, स्कूल के बड़े, इधर उधर पड़े, सारे ही बड़े, जाने-अनजाने,  अनभिज्ञ – अज्ञान में या झूठी शान में, अहम में, खोखले मान में, छोटों को कम करते हैं, सच कहूं तो, हमारे पर कतरते हैं, और थमा देते हैं बैसाखी, ताकत की, जब भी हमको बड़ा होना होता है, हम उसी बैसाखी का सहारा लेते हैं, रौब जमाते हैं छोटों पर, छेड़ते हैं लड़कियों को, मजाक उड़ा देते है, किसी का किसी को, नीचा दिखा देते हैं, कभी शरीर की ताकत, कभी तहरीर की, लड़कियों को शर्म, दलित को कर्म, दो जेंडर में फिट नहीं तो शर्म, ये ताकत हमारे मर्म को मारती है, मर्द हो तो रोना नहीं, औरत - शर्म खोना नहीं! चलिए इन बैसाखियों को तोड़ दें, ताकत के खेल छोड़ दें, अगर हम कम नहीं, तो कोई ज्यादा नहीं, बस इतनी ही बात है! तराजूओं से उतर जाएं, कम ज्यादा, सही गलत, बड़े छोटे, काले गोरे, ये सब बैसाखियों के  प्रकार हैं, ताकत के हथियार हैं!  ये करना आसान नहीं होगा, ये भी मंजूर करिए  ये चश्मे दिमाग में चढ़े हैं, नज़र नहीं आते, पर बहुत बड़े हैं! किस...