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बदलते लम्हे!

छटपटाते लफ्ज़,
जब हलक से निकलते हैं,
चहक जाते हैं,
महक जाते हैं, कभी
बहक जाते हैं,
कुछ असर होते हैं,
कुछ कसर रहते हैं
आज़ादी के ऐसे ही सफ़र रहते हैं!



उम्मीद रास्तों से, 
सफ़र को मंज़ूर कहाँ हैं,
अधूरे रहे मुसाफ़िर, 

और हर ओर मकां हैं!

अरमानों की आग पर होंसलों को सेंकिये,
कोशिशों के हथौड़े,
जब जोर से पड़ेंगे,
फ़िर रास्ते मन-माफ़िक मुड़ेंगे



हाल से, हालात से,
रुठे हुए सवालात से,
किसका जिक्र करें?

और किस माइका लाल से?



घड़ियां चुराते हैं दिन से, 
कि चंद लम्हे हाथ आयेंगे
आप के हाथ में रख्खे हैं 

हाथों से फ़िसल जायेंगे! 

आप के हाथ में रखा है

हाथ कि संभल जायेंगे,
घड़ियां चुराते हैं दिन से, 

कब चंद लम्हे हाथ आयेंगे!
काबिल हैं मौसम,और
हालात भी मेहरबान हैं,
कुछ दिन जिंदगी कितनी आसान है,
आपके सफ़र में अगर अब भी जान है,
याद रहे सारी मुश्किलों को शमशान है!


कितने यकीं हैं सामने
किसको आसमान करें
रास्ते मिल जायेंगे,
साथ, कौनसा सामान करें?




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