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यकीं यूँ कि. . . !

वो भी अज़नबी था और तू भी अज़नबी है,
तख्त पलटा भी है या ये झूठा यकीं है?

यकीं का खुदा कौन हो, यकीं को जमीं कौन हो
अज़नबी का यकीं करें फ़िर अज़नबी कौन हो?

तमाम यकीं है और युँ ही तमाम होते हैं,
आँखें बंद है और उम्मीदों पे जवाँ होते है!

तख्त की बात करके क्यों अज़नबी करते हैं,
दिल में रखिये दिल का ही यकीं करते हैं!

अपने पर ही यकीं रखिये लंबे साथ आयेगा,
पैर फ़िसले भी तो दूसरे का नाम नहीं आयेगा!


इतना कीजे यकीं कि उसको भी आ जाये
लड़खड़ाते पैरों को जैसे जमीन आ जाये!

रंग आसमां के जमीं के, थोड़े कुछ आपके यकीं के

नज़र बायें करिये ज़रा, रंग और भी हैं जिंदगी के!

अब ये ना कहिये कि बेवजह नुक्ताचीनि करते हैं,
नमक आपका है, हम बस जरा नमकीं करते हैं!

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