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काश हम जंगली होते!!

पतझड़ गए तो सावन आते हैं,
इंसान आये तो बर्बादी लाते हैं!


तरक्की विनाश का छद्म नाम है,
इंसान जंगलो में बड़ा बदनाम है!!


पेड़ पौधों जंगल से लड़ता है,
इंसान किस खेत की मूली है!?


क्या लगता है आसमाँ कहाँ हैं,
पैरों तले देखिये क्या निशाँ है?


कूड़ा है चारों और, लंबी इमारतें और कटे पेड़,
आप को क्या लगता है, हमारी क्या प्रकृति है??


पापों के घड़े भरे नहीं शायद,
इस साल भी पानी बरस गया!


इस दुनिया में हम चंद रोज़ के मेहमां हैं,
कब्ज़ा ऐसा किया है जैसे हम ही मेहरबां हैं!!


बैठे हैं जिस पर वही डाल काटते हैं,
किस मुँह से इंसान ज्ञान बाँटते हैं??

प्रकृति से हमारा क्या रिश्ता है?
या सामान मुफ़्त ओ सस्ता है?
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हमारी क्या प्रकृति है? 

दुनिया कि क्या आकृति है?

इंसान के बनने में 
कोई मैन्युफेक्चरिंग डिफेक्ट है,
पालतू जानवर, बालकनी गार्डन
शायद साइड इफेक्ट हैं!

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