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संदेश

देखते हैं, क्या?

जिसे देखते हैं,  वो भी देखता है, नज़र मिल रही है,  या बस एक इत्तफाक है, ये वो लम्हा है, जो खास है. और उसके पहले जो पल था, वो भी खास ही हुआ? नहीं तो ये मिलना इत्तफाक न हुआ? और नज़र में आ गए, उसके बाद?  वो भी खास ही हुआ न? नहीं तो वो लम्हा क्या बकवास हुआ? जिसके बाद कुछ न खास हुआ? नज़रिए की बात है,  सच एक लम्हा भी अगर जिंदगी का खास है, तो ताउम्र जिंदगी खास है देख सकें तो देखें, सच तमाम है इर्द–गिर्द, जो आप चुनेंगे, वो ही आपका खास है!!
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मौसम

मौसम ने जैसे अपना घर बना रक्खा है, तमाम रंगों से हर कोना सजा रक्खा है! पलक झपकते बदल देती है नज़ारों को, जरूरत का सारा सामान जमा रक्खा है! जब जिसको कहे वो उस रंग में ढल जाए, यूं सब से अपने रिश्तों को बना रक्खा है! कोई मुकाबला नहीं है खूबसूरत होने का, इरादों को ही अपना चेहरा बना रक्खा है! जमीं, पौधे, पानी, पहाड़, बादल, आसमान एक दूसरे को अपना आईना बना रक्खा है! इधर बादल आसमान को जमीन ले आते हैं, जमीं ने पेड़,पहाड़ों को जरिया बना रक्खा है! जिद्द क्यों हो सबकी अपनी एक जगह है, बस इंसानों ने ये तमाशा बना रक्खा है!

हमरास्ता!

  दूर आए, नजदीकियों के नज़दीक आ गए, फ़ांसले नहीं हैं फिर भी करीब आ रहे हैं! नज़र को नज़र में नज़र आ रहे हैं, दोनों ही अपने शौक फरमा रहे हैं! मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, और वहीं हैं हम, जहां जा रहे हैं! पहुंचना नहीं है कहीं पर जा रहे हैं, मुश्किल हैं रास्ते पर रास आ रहे हैं! मंजिलों के सौदागर बस बहका रहे हैं, रास्ते कहां जाएंगे, हम कहां जा रहे हैं? हम फकत इन रास्तों से आ जा रहे हैं, यूं धूप–छांव दोनों शौक फरमा रहे हैं! रास्ते ही हमको ठहरा रहे हैं, पूछें  पहुंचना नहीं है तो कहां जा रहे हैं?

मन के मौसम!

  मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, बादल ले कर आसमां आ रहे हैं, रंगों को कुदरत से छलका रहे हैं, ब्रशस्ट्रोक हवाओं के लहरा रहे हैं, कैनवास पल–पल बदल आ रहे हैं, ज़मीन पैरों तले पिघला रहे हैं, खड़े हैं जहां, वहीं बहे जा रहे हैं, मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, और वहीं हैं हम जहां जा रहे हैं! पहुंचे थे पहले पर अभी आ रहे हैं मूर्ख हैं जो वक्त से नापने जा रहे हैं, खर्च वही है सब जो कमा रहे हैं, दुनिया कहेगी के गंवा रहे हैं, और जागे हैं जब से जो मुस्करा रहे हैं!

एलिमेंट्स

  कोई लड़ाई नहीं है, हवा पानी पहाड़ में, जमीन आसमान में, आग और पानी में? पानी बुझा देता है, आग उड़ा देती है आपको लगता है ये लड़ाई है? खासी तंग सोच पाई है! यही सोच तहज़ीब बनी है, तरक्की का बीज बनी है, पीछे छोड़ देना, आगे जाने की शर्त है, ये कैसी यही कवायद है? आखिर सीखा क्या हमने, कुदरत से? पानी और आग की दोस्ती? जब साथ आते हैं,  हवा हो जाते हैं! हवा और पानी  जमीन की सवारी हैं, सदियों से ये सफर जारी है! कोई किसी से कम नहीं, न कोई किसी पर भारी! हर कोई वजह है,  जगह नहीं, पानी, हवा, आग, जमीन, कायनात के कलाकार हैं, कई प्रकार है, तमाम आकार हैं, और जहां जरूरी हो, शून्य, सिफर होने तैयार हैं! बड़ा छोटा, कम ज्यादा, आगे पीछे, ऊपर नीचे इस द्वंद, इस जंग में फंसे आप कब इन कलाकार से सीखेंगे??

सुबह!

उस मोड़ पर सुबह थी,  उस छोर पर सुबह थी, किसी रात की सुबह थी, कुछ बात है सुबह थी, घनघोर बादल के साथ, या उन्हें छोड़ कर सुबह थी? बावजह थी या बेवजह, सबके साथ ये सुबह थी.. आप कहां हैं, कहां आपकी सुबह थी? जाग रही थी साथ,  या दूर भागती सुबह थी? उस मोड़ पर हम थे, हाथ आयी सुबह थी, मिला रही थी कांधे, एक रास्ता सुबह थी, दिला रही थी यकीन, सहर से शाम सुबह थी, रखी थी पीठ पर हाथ, बड़ी इफरात सुबह थी!

खामोशी!

  खामोशी की आवाज सुनी है कभी, उसमें आहट भी एक शोर होती है, एक आह भी घनघोर होती है, कोई कराह दे तो जैसे दर्द के सागर झलकें, कोई सराह दे तो सर आसमान, खामोशी में बड़ी जान होती है, सुनिए, मुश्किल आसान होती है! खामोशी से चाह हुई है कभी? कि उसमें इंतजार भी एक सफ़र है, नज़र उठ जाए तो सहर है, झुक जाए तो कहर है, मुस्कराहट चार पहर है, साहिल से "दो·चार" लहर है! खामोशी की राह चुनी है कभी? नज़र ही इकरार है, नज़र ही इंकार है, नज़र ही इसरार है, नज़र ही नफ़रत, नज़र ही प्यार है! गौर कीजिए क्या आसार है? खामोशी से बात की है कभी? उसको सुनना भी कहते है! और फिर गुनना भी, रिश्ता बुनना भी कहते हैं, सही लम्हा चुनना भी, खामोशी मांगी नहीं जाती, सब के पास है, बहुत काफी और काफ़ी खास है! रुकिए ज़रा, दो घड़ी ठहरिए, सुनिए खुद को, श श शश, खामोशी बोल रही है!