जिसे देखते हैं, वो भी देखता है, नज़र मिल रही है, या बस एक इत्तफाक है, ये वो लम्हा है, जो खास है. और उसके पहले जो पल था, वो भी खास ही हुआ? नहीं तो ये मिलना इत्तफाक न हुआ? और नज़र में आ गए, उसके बाद? वो भी खास ही हुआ न? नहीं तो वो लम्हा क्या बकवास हुआ? जिसके बाद कुछ न खास हुआ? नज़रिए की बात है, सच एक लम्हा भी अगर जिंदगी का खास है, तो ताउम्र जिंदगी खास है देख सकें तो देखें, सच तमाम है इर्द–गिर्द, जो आप चुनेंगे, वो ही आपका खास है!!
मौसम ने जैसे अपना घर बना रक्खा है, तमाम रंगों से हर कोना सजा रक्खा है! पलक झपकते बदल देती है नज़ारों को, जरूरत का सारा सामान जमा रक्खा है! जब जिसको कहे वो उस रंग में ढल जाए, यूं सब से अपने रिश्तों को बना रक्खा है! कोई मुकाबला नहीं है खूबसूरत होने का, इरादों को ही अपना चेहरा बना रक्खा है! जमीं, पौधे, पानी, पहाड़, बादल, आसमान एक दूसरे को अपना आईना बना रक्खा है! इधर बादल आसमान को जमीन ले आते हैं, जमीं ने पेड़,पहाड़ों को जरिया बना रक्खा है! जिद्द क्यों हो सबकी अपनी एक जगह है, बस इंसानों ने ये तमाशा बना रक्खा है!