भीड़ भगवान हो गई है, तीर्थस्थान हो गई है, कुंभ का स्नान हो गई है, मोक्ष का सामान हो गई है, स्टेशन बैठे चार धाम हो गई है! किस ने सोचा था? ये दिन भी आयेगा, बराबरी की लड़ाई, ऐसी टु के कोच लड़ी जाएगी, जिसकी लाठी उसकी सीट हो जाएगी, हक की बात इतनी आसान हो जाएगी, भीड़ ही संविधान हो जाएगी! कुंभ जाने की ये विधि विधान हो जाएगी! सब एक हो गए हैं, एक संदेश, एक दिशा (भ्रम), मंदिर वहीं बनायेंगे, मस्जिद वहीं गिराएंगे, उसी मुहूर्त नहाएंगे, करोड़ों की भीड़ बनेंगे, सब भेड़ हों जाएंगे!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।