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बस यही बात है!

  साथ है बस यही बात है हां कई जज़्बात है,  जज़्बात काफूर हैं साथ हालात है, साथ है बस यही बात है! साथ है, दिन है, रात है, काम की बात है,  ज़ाहिर मुश्किलात है, मुश्किल कम’उम्र है, साथ सफ़र है, साथ है बस यही बात है! साथ है, मुलाक़ात है, तुमसे तो, खुद से भी, अजनबी फिर भी कई लम्हात हैं, बाक़ी कई बात हैं, सो साथ हैं  बस यही बात है! साथ हैं, सवालात हैं, तमाम जवाबों के, जो अधूरे हैं, जो बदल गये, कुछ फिसल गए, छूटे नहीं हैं, साथ हैं, बस यही बात है!

भूल-चूक, लेनी-देनी!

जो गुज़र गया एक ख्वाब था जो रह गयी एक याद है! जो गुज़र गयी एक आस थी जो रह गयी एक प्यास है! जो कह डाली वो बात है, जो बची वो तन्हा रात है! जो मिल गया एक साथ था जो खो गया वो प्यार है? जो ठहर गया एक पल था जो गुज़र गया वो वक्त है! जो टूट गया एक तार था, जो रह गई एक झंकार है! जो है वोही सब हालात हैं, संभले नहीं वो जज़्बात हैं! तुम हो तो सारी बात है,  जो नहीं तो वोही बात है! जो दब गई वो आवाज़ थी, जो बच गई वो खमोशी है!

यूँ होना!

मुझे खोना नहीं आता 'मैं' हूँ पर होना नहीं आता, चादर बहुत हैं सोने को, ओ मुझे बिछौना नहीं आता गम हमको भी हैं तमाम, उनके कंधे रोना नहीं आता अकेले भी अच्छे हैं बहुत, गोया हमें खोना नहीं आता!! उनकी एक ही शिकायत बस, जहां हैं वहां होना नहीं आता! आख़िर भूल जाते हैं सब, सबको, हमें किसी का होना नहीं आता! फर्क पड़ता है, क्या फर्क पड़ता है? क्यों हमें हक़ीकत होना नहीं आता? खुश होंगे सब इसलिए कह दें? हमें बातों को चाशनी डुबोना नहीं आता

ज़ाहिर बात!

हमसे ही हमारी बात करते हैं, हम भी उनसे ये शिकायत करते हैं! हम नहीं जज़्बात ज़ाहिर करते, वो हमसे यही हिदायत करते हैं! नींद ही ऐसी के बिछड़ जाते हैं, और वो सपनों की बात करते हैं! काम, नाम, आराम सब साथ है, झग़डे, तो हम मशवरात करते हैं! लंबा सफर है, हो चला और बाकी हम कहां मंज़िल की बात करते हैं! अकेले भी दोनों अच्छे खासे हैं! साथ में तो हम कमालात करते हैं!! अरसा हुआ अब सारे एब ज़ाहिर, उम्मीद से रोज़ मुलाक़ात करते हैं! एक हैं पर एक जैसे नहीं, फ़र्क, हमें समझदार करते हैं

छियानवे बाईसी

बात तारीख की नहीं तारीख़ी की है, गौर कीजिए ज़रा बारीख़ी की है। साल छियानवे, महीना जून, मुकाम अहमदाबाद, अकेले थे 'हम' चन्द मुसाफिरों के साथ, थी पहली मुलाकात, हम तब भी रिश्तों के ज़ाहिल थे, और वो तब भी रिश्तों के क़ाबिल! फिर भी कुछ सुर मिल गए, कुछ ताल जम गई, और कुछ बाल रंग गए! वो दुनिया के अकेले थे, हम दुनिया के अजूबे, अलग रास्तों पर चलने के शौकीन, मुसाफिरी तो उसी वक्त शरू हुई, फिर धीरे धीरे रास्ते एक हुए, और हमसफ़र नेक हुए! बाइसों बाते हैं, चौबीस घँटे का साथ है घर की बात नहीं, काम की बात है, काम भी साथ है, अब हम ही मुश्किल हैं, एक दूजे को, ओ हम ही आसान भी, उलझन भी हम ही हैं, सुकूँ भी! सफ़र ज़ारी है, मंज़िलों के हम दोनों ही गुनहगार हैं, रास्तों के तलबगार! और अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें! अपनी राय और हमारी चाय में फर्क करें!

रहने दो!

मुश्किलों को तुम मेरी आसान रहने दो, अभी खुद को तुम मेरी जान रहने दो! ज़िन्दगी सफर है बस यही काम रहने दो, मंजिलों को अभी ज़रा अंजान रहने दो! भूल जाएं सब शिकायतें ओ शिकवे सफर में ज़रा कम सामन रहने दो! तुम ही हो मेरी दुनिया में और क्या, ये दुनिया बस मेरे नाम रहने दो! आईना भी और परछाई भी हैं दोनों, लाज़िम है यही, यही पहचान रहने दो! साथ हैं बस उसी में सारी बात है, ज़ाहिर हैं, वही मेरे अरमान रहने दो!

ज़िंदगी आसान - निशा आदित्य टाईप!

साथ आपका, सफ़र साथ का, ज़िंदगी इतनी आसान चाहिये! बहुत किया इंतज़ार ज़िंदगी, साथ साथ ही काम चाहिये! आपस में ही पटना-निपटना है! बस और क्या अब काम चाहिये? बचपन पास है, ज़वानी साथ है,  बस उतना ही सामान चाहिये! ढूँढ ली जगह दिल में रहने कि, हमको कहाँ कोई मकान चाहिये जिसको देखो ' हमें मालूम था' फ़िर भी सबको एलान चाहिये! इश्क़ लम्हा, हमसफ़री रास्ता है,  ऐसेइ थोड़े हमको प्लान चाहिये? जो है सो है, सीधी सी बात है,  इसमें क्यों कोई विज्ञान चाहिए? अपने हिस्से की दुनिया हम बदल लेंगे, अभी शुरू है बस थोड़ा टाइम चाहिए!

हमसफ़री के 18-19

  फांसले अब भी आसाँ हैं नज़दीकी अब भी मेहमान इश्क के मुसाफ़िर हम हमसफ़र, आज हम जवान हैं फांसले दूर नहीं करते नज़दीकी मज़बूर नही करती इश्क के मुसाफिर हमसफ़र अपनी एक जुबां है करवटें अब भी नादाँ हैं इश्क अब भी शरीर एक काहिल और एक काबिल बात बाक़ी है इश्क जायज़ है रिश्ता नाजायज़ तमाम वज़ह ज़ारी आज़माइश रास्ते एक हैं फ़ितरतें अलहदा इश्क के मुसाफिर हम हमसफ़र अपनी एक अदा है हमसफ़री के १८-१९  जवाँ हुए हैं इन दिनों, हमतलबी के शिकार,  अपने मर्ज़ों की हमदवा हैं! साथ-सफ़र का सामान क्या वादों की जरूरत क्या तज़ुर्बे सब रस्ते मिलेंगे और सस्ते, मुश्किलें इरादे अब भी नादाँ हैं, इरादे अब भी आसाँ हैं, इरादे अब भी झांसाँ हैं, इश्क के मुसाफ़िर, इरादे अब भी सामाँ हैं!

मोहब्बत के गुनाह!

हमको भी मुहब्बत के गुनाह आते है , आप कत्ल करिये हम गिनाते है करते है दो कपड़ों को घड़ी , दो लम्हों को भूल जाते हैं तमाम इरादे और चंद वादे , कमबख्त हालात बदल जाते हैं , उम्र हो गयी साथ चलते चलते हम आज भी आगे छूट जाते हैं ! हम को सफ़ाई देने से फ़ुर्सत नहीं आप सफ़ाई की याद दिलाते है बड़ा शौक है हमको दुनिया का , और आप मेरी खरोंचे दिखाते है खुद की गिनती को भूल जाते है आपकी आदतों में हम भी आते हैं , कहने को हज़ार बातें है लिखते कहे कहो तो साँप सुंघ जाते हैं ! हमको भी मुहब्बत के गुनाह आते है कैद कीजे फ़िर वही पनाह आते हैं

एक दो तीन. . . चौदह,पन्दरह

--> बचपन के तेरह , अल्हड़पन के पांच जवानी के छह – आठ और दीवानगी के पन्द्रह कभी सोचा था  ? दीवानगी सबसे काबिल साबित होगी  ! हाथ होगी  , साथ रहेगी  , मुश्किलो  की बात रहेगी , और मुश्किलो को मात रहेगी एक उम्र पीछे छोड दी  , बचपन , अल्हड़्पन और जवानी  , नहीं कह सकते  , हार मान गये  , पर ये जरुर भान गये  , जान गये  , दाल कभी कभी गल सकती है  , जल सकती है , पर पल नहीं सकती या फिर युँ कहिये , कि सब ने अपनी जगह ढ़ुंढ ली  , बचपन आता है  , टोह लेने  , खेल जाता है , तु - तु , मैं - मैं , अड़ जाता है कभी जिद्द् पे  , जाओ कट्टी ! निराश होने कि बात नहीं  , जवानी भी तो ताक लगाये बैठी है  ,  मन ही मन कहती है  , “ मिठ्ठी - मिठ्ठी " अल्हड़्पन भी कुछ कम नहीं सताता  , अपनी धुन में आ जाये तो उसे कुछ नहीं भाता  , मुँह फ़ुला , और कुछ नहीं बताता  , चॆहरे के सामने पीठ होती है  , ये उमर ही ऐसी ढ़ीट होती है  , और चंच...

मैं और तुम

मैं क्या महसूस कर रहा हूँ  ये महसूस करने की कोशिश सोच रहा हूँ मगर कोई ख्याल नहीं करता तो हूँ बहुत कुछ पर तेरे सवाल नहीं वक़्त वापस नहीं आता कुछ शुरू, कुछ खत्म नहीं होता उस दर्द का क्या करें जिसका जख्म नहीं होता न उम्मीद टूटी है  न एहसास छूटा है न कोई दूरी है फिर भी हर पल       लम्हों की प्यास है मैं तो मुस्कराता रहता हूँ फिर क्या है जो उदास है खाली प्याले...अधूरे निवाले...बिस्तर की सिलवट...  मैं और तुम सच कोई परिभाषा नहीं कोई अतीत नहीं न कोई कोशिश कुछ होने की करने की मैं और तुम सोच से परे गहरे समय से मुक्त मैं कहीं खत्म तुम कहाँ शुरू इंतज़ार अधूरेपन की सम्पूर्णता मैं कहाँ शुरू तुम कहाँ खत्म इस क्षण इस पल सच विचारमुक्त मैं और तुम