कहाँ जाइए? पैरों ज़मीन है, सर आसमान, छत आसरा है, चारदीवारी सहारा, फिर शिकायत क्या, डर क्यों, हर लम्हा बदल रहा है, क्योंकि हवा बह रही है, रगों में खून चल रहा है, मायने हैं ज़िन्दगी के कहीं न कहीं, कुछ न कुछ बदल रहा है! रुकना, ठहरना, स्थिरता किस लिए? के आप समझ पाएं...जाएं चलना ही नियत है, नीयती अच्छा हो आप बनाएं यही नीयत भी! दुनिया चल रही है, एक एक पल, आप रुक कर, कहाँ जाईए? चलिए बताइए? कहाँ जाईए?
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।