मैं मैं हूँ चीख रहा हूँ पर शोर इतना जो सुनाई नहीं देता! रोशनी इतनी कुछ दिखाई नहीं देता इसमें “मैं” कहाँ हूँ? अपनी नज़र में डूबता , तैरता मेरा नज़रिया किसी किनारे टिक नहीं पाता और किनारे हैं कहां? सब डूबे हुए खुद में “ खुदी” में राग अलापते , “ मैं … मैं … मैं” बस मैं नहीं …….. इसमें कहीं!!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।