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ये क्या हो गया है?

जो मिट्टी को जान देता है, किसान ! उसपर गद्दारी का इल्ज़ाम हो गया है!! हक मांग रहा है बस अपने पसीने का, पर कान सल्तनत का ह राम हो गया है! पहुंचते नहीं हाथ दूर बहुत है, ये कैसा संविधान हो गया है? राम बोलने वाला ही भगवान हो गया है, यूं कत्ल कितना आसान हो गया है? अल्लाह का फ़ैसला अब भगवान करेगा, इंसानियत का काम तमाम हो गया है! फ़ैसला ये की तेरा मजहब क्या है , गुनहगार का नाम मुसलमान हो गया है इंसाफ देने वाले सब पंसारी बने हैं, वजन देख सारा हिसाब हो गया है! गलत है! पर भीड़ की अकीदत है ये, जो तोड़ा वही उनका मकान हो गया है!

संविधान वाली देशभक्ति!

सीखें, आवाज़ उठाएं, साथ आएं, चलों अपने अंदर अम्बेडकर जगाएं कोई भी खास नहीं हैं पैदाईश से बराबरी करने को कंधे से कंधा मिलाएं हर कोई खास है, जो भी पैदाईश हो, जात धर्मे के अब बहाने ने बनाएं! मैला साफ़ करता है कोई कचरा, अच्छी बात है! तो आप हरिजन कहलाएं! सीखें, आवाज़ उठाएं, साथ आएं, कहदो सब से कागज़ नहीं दिखाएं! सीखें, आवाज़ उठाएं, साथ आएं, चलो सब यकीनों के सवाल बन जाएं!! सच नहीं बदले तो नाम बदल दें? किसको शौक है दिव्यांग कहलाएं? बहुत हो गई चापलूसी हिंसा, चलो अंबेडकर वाले देशभक्त बन जाएं! संविधान ही है जो हमें बचाएगा, चलो मिल कर संविधान बचाएं!

मनमंदिर!

उम्मीद छोड़ दी पूरी , आज़ाद हो गए! थोड़े थे आज पूरे ही बरबाद हो गए!! गिले - शिकवे सारे बेआवाज़ हो गए! नफ़रत के खिलाड़ी नाबाद हो गए !! अपने से ही अब सारी शिकायतें हैं! अपने इरादों के दगाबाज़ हो गए !! दिल रखना है बस अपना किसी सूरत! गुम अपने से ही सब सरोकार हो गए !! सराब जितने थे आज़ खराब हो गए! कसर नहीं बची हम पूरे मक्कार हो गए! ! मुगालते नहीं कुछ , पूरे तैयार हो गए ! अपने से किए वादों के बेकार हो गए !! तमाम यकीन थे सब फ़रेब निकले! अपनी समझ के हम नाकार हो गए! ! अब क्या खुद को आईने दिखाएं!   अपने अक्स खुद् को नागवार हो गए !! उम्र से कोई शिकायत कभी न थी! आज और थोड़े हम तैयार हो गए !! जश्न के शोर हैं अपनी ही गलियों में! एक और सफ़र के आसार हो गए !! नश्तर जो भी थे सब सवाल हो गए ! जख्म तमाम अब लाइलाज़ हो गए !!

भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार

भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन गया है अमीर की थाली का अचार, बाबा की थाली का प्रसाद बन गया है, पैसा लेना संकुचित मानसिकता का करप्शन पर असली भ्रष्टता क्या है, साँठ-गाँठ, पीठ के पीछे हाथ, मैं ड़ॉलर ४० का कर दूँगा, तुम जीने की कला को फ़ला देना, फ़ैला देना, पैसे कि लेन-देन बच्चों का खेल है, गेम काँच की गोली, फटी ज़ेब ने पोल खोली, पर असली बेईमान, ताकत का इस्तमाल करने वाले लोग हैं, इशरत के हत्यारे, पांडे और बंजारा हैं? शाह की शय वाले, अडानी के जहाज सवार, गाय पर सवार, बीफ़ के व्यापार! लाल बत्ती पर सिग्नल तोडा, ज़नरल के टिकिट पर ए.सी. खोला ये सब आम आदमी की टुच्चयाई है, इसमें देश की बात कंहा आई है? बिना टेंडर के कॉण्ट्रेक्ट , बेनामी खाते में एड़जस्ट, टार के उपर सीमेंट की सड़कें, बोफोर्स बंदूकें और कारगिल के कॉफिन, सियासत में बैठे लोगों के यकीन, राम के नाम और बाबरी तमाम, ये है बईमानी, सबसे बड़ी, सबसे घातक, संविधान के साथ धोखेबाज़ी इससे ज्यादा क्या भृष्टता होगी? 84/2002/ हाशिमपूरा /मुम्बई और कई सरकारी दंगे, ये है बेईमानी, देश से, देश के विचार से, और इंसानियत से दग़ाबा...

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं - रोहित

सांप सुंघ लीजे. . . सांप भी मर गया और लाठी भी टूट गयी, आँखे खुली, खोलो!! समझ आये तो समझिये,  न सांप, सांप था न लाठी मारने वालों की थी, इसे कहते है शातिर, पेश-ए-ख़िदमत है,  हिन्दू समाज की  वर्ण व्यवस्था आपके ख़ातिर,   आप जात बताइये,  ये आपकी औकात, एक तरह का पौराणिक एप है, काम आसान करने वाला, किसका? मूरख सवाल पूछते हो, तभी तुम अछूत हो!  अछूते.... तमाम मिडियोकर,  गली के आवारा कुत्तों की तरह सर पर 24*7 लटकते, जातीय सचों को  खिलौना बनाकर, एक बच्चा, खुद कठपुतली बनने से इंकार करता है, तो रोहित (वेमुला) उदित होता है, रोशनी बनता है, अगर आप को नहीं दिखती तो आप अंधे है, या जात या मानसिकता के पंडे, अवस्थी, तिवारी, श्रीवास्तव, गुप्ता, रेड्डी, नैयर, मेनन.... पंडे,   जो हमेशा अपने झंडों पर खड़े होते है, किसने देखा है कि वो किनकी कब्रों पर गड़े होते हैं, इनकी काबिलियत पर प्रश्न नहीं उठा सकते, बड़े बड़े काम ये करते हैं, इतने बड़े घड़े बनाये हैं, पापों के, के सदियों से नहीं भरते, और जस्ट इन केस कभी कोई  भारी भूल हो जाए, ...