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आभा और एक शोध ☺

एक सवाल है, जिंदा, संजीदा, नाज़ुक, नमकीन वजन भी है सृजन भी है, यूँ ही नहीं खड़ा, जिद्द पर नहीं अड़ा, पर ख़त्म नहीं होता, आप नहीं तो कोई और सही, कोई और नहीं तो कोई और सही, सवाल आप का भी शायद, और हमारा भी, अंजान मंज़िलों के मुसाफ़िर का, सहारा भी, सवाल हों, तो रास्ते खत्म नहीं होते, न उम्मीद थकती है, न हौसला पस्त होता है,  सवाल की लाठी एवरेस्ट तक ले जाती है, और सवाल समन्दर के तल से लेकर, चाँद के कल तक ले जाते हैं, सवाल सिर्फ सवाल होते हैं, मुश्किल या आसान, ताकतवर या कमज़ोर, साथ में या ख़िलाफ़त करने, प्यार या दुत्कार, ये आप के ऊपर है, सवाल धुरी हैं, न हो तो हर बात अधूरी है, और कमाल देखिये सवाल क्या चाहते हैं? उनकी क्या मांग है? दिल सवालों का क्या चाहे?... एक खोज, कब क्या क्यों? एक रास्ता, कहाँ, एक शख्श - कौन हर पल एक सवाल हर लम्हा एक शोध, शोध! अभी और क्या? सवाल को और क्या बेहतर साथ हो, एक उम्मीद हो, एक प्यास हो, एक साज़ हो, एक सोज़ हो, मुबारक आपको अभिशोध हो! (Abha for your spirit, for your quest, for y...

तलाश का इन्तेज़ार

वो रोशन रात थी या उज़ालॊं की लाश थी   बुलंद इमारत, कामयाब इबारत, अंदाज़ जश्न के, और इतनी रोशनी कि सच्चाई जल गयी, ठिठुरती बेबसी अधनंगी सी, कैसे पल गयी, " काश” होती एक जिंदगी, जैसे गड़्ड़ी से फ़िसल गया ताश कोई, बेसबर नज़र इस आस में‌ कि मिलेगी तलाश कोई, और हम बस चल रहे हैं,  एक और शाम, और हम निगल रहे हैं, अंदाज़ भी है, एहसास भी, इरादे भी, फ़िर भी सहारा दे नहीं पाती,  तिनका हुँ? पर खुद भी बह रही हुँ, किनारा होने को . . . . क्या नहीं दे दुं! नज़रें बेबस से नहीं मिलीं,  पर खुद की बेबसी संभल गयी, एक रास्ता नहीं मिला, पर अपनी सुबह को रोशनी दिखा दी, कैसे कहुँ मज़बुरी थी, मेरी नज़रॊं ने आज़ मेरी उम्मीदें जगा दीं! आमीन! - किसी के फेसबुक स्टेटस से चुराई, नीचे लिखी भावनाओं को समझने की एक कोशिश,  ["And on my evening walk I see this huge bunglow flooded with lighting, must be a wedding home and outside the house lay a half clad begger shivering in the cold..........and I feel so small about being able to do nothing about this 'george of life'. If only...

जो है सो है! हाँ नहीं तो!!!!

क्योँ आसमानी बुलंदी पर नज़र है, गर आपके इरादॊं में जिगर है? क्या इरादे आसमान चाहिये, या बस इसाँ आसान चाहिये? एक काबिल अंदाज़ चाहिये या सर कोई ताज़ चाहिये?  सामने सफ़र है पीछे घर है, काहे को पुकार चाहिये?  तमाम सलाहियतें और खुब कमियां नज़र जरा नज़रअंदाज़ चाहिये युँ ही दुरियाँ कम नहीं‌ होतीं (जमीं आसमान की)‌ पलकें थोड़ी सी नम चाहिये! झोली भरने को नहीं, संभलने को है फ़कीरी में क्यॊं गोदाम चाहिये? जो मिला है वो काफ़ी हो, काहे किसी को राम चाहिये?

बातों बातों में.....

कहीं कुछ रोकता है क्यों.... खुला दिलो-दिमाग हो तो दरवाज़े दीवार नहीं होते, आपस की बात है, वरना ये आसार नहीं होते  देखने और होने के बीच के फ़ांसले .... नज़र आँखों में नहीं यकीन में होती है,  एक हंसी से भी जिंदगी हसीन होती है! सब एक नाव में सवार हैं . . . आपको हमारे माथे की पेशानियां नहीं दिखती, जमीं रहने दो, वरना लब्जों में जान नहीं दिखती सफ़र आपके भी हैं और अपने भी.... गुजरते हुए लम्हे हैं गुमराह मत हो,  मुश्किलें मील का पत्थर हों, सफ़र न हों! तक्दीर फ़क्त एक रास्ता है,  मंज़िल नहीं होती, मुश्किल, मुसाफ़िर न हो, तो वो मुश्किल नहीं होती! मुसाफ़िर होना फ़कीरी काम है, सफ़र में यही बस एक नाम है!.... हमारा दुनिया में होना ही एक सफ़र होता है,  कौन सी राह से गुज़रेंगे, ये अपनी नज़र होता है! मुसाफ़िर रहना हो तो फ़कीरी अंदाज़ हों, कटोरा हम देंगे मुबारक आपकी आवाज़ हो! हाथ फ़ैला दिये तो कटोरा तैयार है,  दिखती सामने होगी, पर जहन में है, वो जो दीवार है, सच करवट बदलते हैं.... दुविधा भी सुविधा का दुसरा नाम है, वो बहकना क्या जो हाथों मे जाम है? मोड़...

गुजरे लम्हे, बिखरे अशार

रंगों के सवाल या रंगों से सवाल? हकीकी उमीदें या सिर्फ ख्याल? गहरे पैठेंगे या बदल करवट बैठेंगे? तजुर्बे  रास्ता देंगे या पीठ को एठेंगे पलटते रास्ते, थके हुए सवाल, ऊंघती उमीदें, दम तोड़ते ज़ज्बात, बड़ते कदम, ललचाते प्रश्नचिन्ह, नज़र आसमान, ये एहसास एक और सफर नज़र मैं है, एक और कदम असर में है, निकल पड़े हैं फिर रास्तों पे, एक और सुबह सहर पे है जिंदगी निकली है फिर रास्तों की तलाश में फूंक रही है जान जैसे, अपनी ही लाश में ! कितनी सारी उम्मीदें बंध गयी हैं काश में और कोशिशें उलझी हैं अपनी तराश में   गुजरे लम्हे बिखरे अशार, ओर एक अरसा होने को है मायने यतीम घूमते है कितने, यकीं अपना खोने को हैं कलम करने से सब सच्चाई हाथ नहीं होती फिर भी चल दिए कि गंगा पाप धोने को है   भूख पाली है या सिर्फ हाथ फैलाये बैठे हो चादर मिल गयी लंबी तो पैर फैलाये लेटे हो ख्वाब बुने हैं कल के या नींद भरोसे बैठे हो जिंदगी जी रही है तुमको या तुम जन्दगी को जीते हो   एक और रास्ता सफर होने को है, और एक एहसास नज़र हो जायेगा और एक तजुर्बा उम्र होने को है और एक फलक हमजमीं हो जायेगा...

तलाश

मंजिल कि खबर कैसी, रास्तों का पता क्या? खो जाना कोई मर्ज नहीं, फिर उसकी दवा क्या? क्या समझेंगे जिनको जंजीरें रास्ता दिखाती हैं जिनकी हर सुबह को शाम आती है, उन लम्हों का क्या जो खत्म नहीं होते? उन चोटों का क्या जो कभी जख्म नहीं होते? हर आह का मतलब क्यों? हर वाह का हिसाब क्या? कुछ रस्ते चलने से तैयार होते हैं! और नक्शों पर सिर्फ कल रहता है! सवाल बेमानी है अगर कोई हल रहता है, वो खोज ही क्या जो खजाने पर खत्म हो? रुकिए तभी जब सामने कोई प्रश्न हो??

लाश की आस!

                                  अब क्या तलाश है तैयार होती एक नयी लाश है वक़्त खामोश है, या इतना कुछ कह रहा कि कुछ हाथ नहीं आता कुछ बदलने वाला है, कुछ पुराना होता है, अतीत जमीं होता है, नया उगता है पर इस लम्हा वो दौरान है कुछ नज़र नहीं आता इस लिए इरादा परेशान है अब जाने दीजिए अगर कोई काश है नया होने को एक नयी लाश है !!