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इंसानी प्रकृति!

आपसी रिश्ते सिर्फ़ इंसान से रिश्तों से खून के जातीय मकान से खरीदे सामान से पसंदीदा पकवान से पालतू जानवर , या धर्म की मानकर और धरती से ? जिसके उपर सब खडे हैं ! क्या हम सब चिकने घडे हैं ? कहां वो शुरुवात हुई , जो आखिर हमारी मात हुई ? एक अलग ईंसानी जात हुई बुद्धि , विवेक , संवेदना की बात हुई ? और फ़िर लगे जंगल कटने , जानवर जंगली बन गए , संरक्षित , जो बचे हैं , हमारी दयामाया से , क्या है हमारी प्रकृति ? हरियाली से हमारा क्या रिश्ता है ? या वो सिर्फ़ एक चीज़ है , बाज़ार की दुनिया वाली , इस्केवर फ़ीट के दाम वाली , या छुट्टिंओं वाली , हमारे ज़िंदगी के हसीन पलों की , याद दिलाने वाली , तस्वीरों की पॄष्ठभूमि ? धरती को माता कहते हैं , इसे तो नाता कहते हैं ! इंसानी दुनिया को पालने - पोसने वाली , फ़िर क्यों ये हाल है ? क्यों प्रकृति बेहाल है ? भूकंप , सुनामी , सायक्लोन , ज्वालामुखी , जंगल जंगल आग कहीं ये जज़्बात तो नहीं ?

विकास विकासम विकासस्यम!

ये दुनिया,  और हम इंसान,  इसका केंद्र,  सब कुछ हमारे इर्द-गिर्द घूमता है,  क्योंकि हमें आगे बढना है,  सबसे आगे,  हर उंचाई पर चढना है, हमसे बेहतर क्या है?  ये कोरोना क्या है? तमाम ज़ंग हैं,  जिनसे लड़ना है,  भूख, पितृसत्ता, घरेलू हिंसा  देह व्यापार, बाल मज़दुर  और हमने क्या चुना है?  नफ़रत, मज़हब,  फ़ूट डालो और राज करो!  अमन-शांति  सब को जगा देगी,  उन सवालों तक पहुँचा देगी,  जो सच की तलाश में हैं! बादल,  हमारा आसमान हैं,  ऐसा हमारा ज्ञान है  जो सामने आ गया  उस को सच करते हैं,  खोज, तलाश, शोध  विज्ञान, सवाल, सुक्ष्म सोच,  ये सब बेकार बातें हैं  हमारे सच, आजकल  व्हाट्सएप पर आते है और हम उसे,  और दस लोगों तक पहुँचाते हैं,  फ़ॉरवडेड एज़ रिसीवड! एक बीमारी के फ़ेल हैं  घर बैठे जेल हैं  तरक्की के ये खेल हैं  एक वाइरस के बेकार हैं इतने हम लाचार हैं  'कुछ नहीं कर सकते'  ये विशेषज्ञों के उपचार हैं  कोविड 19 की व्यापकता  और गु...

सबका विकास, अकल का अवकाश!

सब बडा है,  सभ्यता, तरक्की, घमंड  और बड़बोलापन,  इंसान आज  घुट्ने टेके खडा है! चाँद तक पहुँच है,  दिमाग की समझ है,  सूरज की बिजली,  जमीन से तेल,  तेज़ रफ़्तार सब,  और अब? हर तरफ़ जंग है,  सोच इतनी तंग है,  किसी को पीछे छोड देना,  कामयाबी है!  नज़र नहीं आती,  चारों तरफ़ बरबादी है! आईने  दिखा देंगे सच,  आप नकाब तो हटाईए,  आप पूरे हैं,  और क्या चाहिए? सुनिए, खुद को, गौर से,  दूर हो,  दुनिया के शोर से,  आप किसी की राय नहीं हैं,  उदासी को निराश न करो,  अकेलापन, अधूरा मन,  सुन,  आपको दोषी नहीं ठहराता!

शिकवा ए सुबह!

पूना शहर, जैसे इमारतों का कहर, फर्क पड़ता है? क्या शाम, क्या सहर? फर्क पड़ता है! आपकी नज़र का, उसके असर का, आप पर? पर आप को फुर्सत कहाँ? यूँही गुम होती... एक और सुबह!