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अपनी ही राख़!

ये कैसा वनवास है, क्यों थक गई मेरी प्यास है? क्यों मुस्कराहट उदास है? अब भी जल रही हूँ, देख, सुन, वो आह जो बदहवास है, छू रहे हैं दर्द अब भी, नहीं जो मेरे खास हैं, महकी हुई है दुनिया जो मेरे आसपास है, चुस्त सारे हवास (senses) हैं, ये कैसी बेदारी (awakening) है, एहसासों की बेगारी है, "मैं" फिर भी मैं हूँ, अपने महलों से सुसज्जित, लज्जित,  अपनी रोशनी से झुंझलाई, जो उन अंधेरों तक  पहुंचते नहीं, जहाँ मेरी नज़र जाती है, किस से मुँह फेरूं, ख़ुद से, या अपने एहसासिया निकम्मेपन से आख़िरकार मैं ही कम हो रही हूं, अपनी ही संवेदना से, जल रही हूँ, जल चुकी हूं? क्या मैं अपनी राख हूँ? अपनी ही रोशनी में जल रहे हैं! राख बन कर अपनी चल रहे हैं!

रोज़ होते कम!

कितने टूटे हैं हम, कितनी दरारें हैं, रिस रहे हैं  हज़ार जगहों से, लाख वजहों से, कितने कम पड़ते हैं, अपना कहकर, अपनों से लड़ते हैं, छीन लेने को,  उनका यक़ीन, उनका प्यार ज़ख्मों का कारोबार, हिंसा का सिक्का, इतना डर? कैसे इतने हम खर्च हो जाते हैं? खुद को भी बचा नहीं पाते हैं? दुनिया की बंदर बांट में, फिट होने को, बहाना! खुद को तराशते हैं।  सच कुछ और! ख़ुद को ही काटते, छांटते, नापते, हर मोड़ कुछ और कम हो जाते हैं, और फिर  ख़ुद को ही ढूंढते हैं, ज़हन में दरबदर घूमते हैं, न ख़त्म होने वाली तलाश, हमारी लाश! कितने हम बिखरे पड़े हैं, टुकड़ों में,  हर जगह, घर में, दुनिया में, अकेले में, काम पर, दोस्तों के साथ, हर जगह,  अधूरे बड़े हैं, हर लम्हा पूरा होने, खर्च होते हैं, चमक चुनते दुनिया कि, अपने अंधेरों को शर्माते हैं, अपने सामने, खुल कर कब आते हैं? नाम कमाने को अपना, ख़र्च हुए जाते हैं, बड़े सस्ते  खुद को निपटाते हैं! भीड़ में एक नाम? जय श्री!!!

बेकल मन!

मैं उदास हूँ, कल था, आज हूँ, आस हूँ, प्यास हूँ, उम्मीद से हताश हूँ, मैं ख़ास हूँ, फिर भी, अपने ही सवालों से बदहवास हूँ, अकेला, अपने साथ हूँ, और भी हैं, बात करने को, पर आखिरकार दिन लंबे हैं और रात, बोलती है, और न जाने कैसे, दिलोदिमाग  के सारे अंधेरे कोनों में गूंज उठती है, उनका सामना करती अपनी ही मुस्कराहटों से थक चुका हूँ! सच चुका हूं! अपनी कामयाबी से,  जो मेरे चारों तरफ है, सामान बनकर, जेब में पड़ीं दीवारों पर जड़ी, लाइफ़ साइज़ तस्वीरें,  मुझे ही क्यों छोटा करती हैं? कितनी चमक है मेरी, मन बहलाती कभी मुझे ही झुठलाती, आगे क्या है? मेरी क्या वज़ह है? मेरी क्या जगह है? सपने, जो मैंने पाले हैं, दिल पर उसी के छाले हैं! अपनी ही मुस्कराहट से उदास हूँ, लगता है अपने पास हूँ, और दूर तक रास्ता नहीं कोई, इसलिए चलता हूँ! बहुत उलझाते हैं ख़याल, सवाल, इसलिए निकलता हूँ! यही एक रास्ता दिखता है, जो मुक़म्मल है! इसमें कहाँ कोई कल है, आज मन बड़ा बेकल है! चल!