हर सफ़र को हमसफ़र लाज़िम है बेचारगी कैसी कि कोई काश मिले यूँ सफ़र करते हैं इस दौर के इंसान मुड़ के देखें तो रस्तों की लाश मिले हमसफ़र साथ चलने को और क्या मत सोचो कि मंज़िल कोई पास मिले उम्मीद बेमानी कि कोई खास मिले तस्सली जो साथी कोई रास मिले, पास आने से दुरियाँ नहीं मिटतीं, गनीमत हो जो ये एहसास मिले नज़दीक आईये खत्म नहीं हुए, लम्हों में शायद कोई साँस मिले, कब कोई लम्हा कहीं उदास मिले, यूँ देखिये शून्य में कोई आस मिले!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।