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नैतिकता के बाज़ार!

इंसान उद्दण्ड हैं, झूठा सब घमंड है, दुनिया पर वर्चस्व का, नैतिकता, सभ्यता, घटिया मज़ाक हैं, बाज़ार का राज है, और सब बिक रहे हैं, मुंहमांगी कीमत मिले तो आप विजेता हैं, सही कीमत, आंखों पर पर्दा है, आप फिर भी सामान हैं! दर्द न हो  इसलिए मर्द हैं? तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, एक्सप्रेस हाइवे,  चमकीले साइनबोर्ड, गगनचुंबी इमारतें,  क्या दिखाते हैं,  लॉकडाउन में  क्या छुपाते हैं,  हैरतअंगेज बात,  लाखों सड़क पर  तब कहाँ जाते हैं? चलते नज़र आते हैं,  जब शहर चलता है! सब कुछ ख़त्म नहीं है, कितनों ने हाथ बढ़ाए हैं, कंधे मिलाए हैं, मजबूरी के दर्द, दर्द की मजबूरी आमने सामने हुए साथ आए हैं, हमदिली है, शुक्र है, सब का, गुज़ारिश एक, सवाल एक साथ रखिए, कल हमें ये सब, कहाँ नज़र आएंगे?

करज़दार

यूँ भी किसी के शुक्रगुज़ार न रहो,  न कर्ज़ बनो ओ' न उधार ही रहो! हमसफ़र हैं सभी इस दुनिया में,  कभी कि सी के गुनहगार न रहो मेरी मर्ज़ी थी सो मैंने कर दिया, मर्ज़ी तुम्हारी तलबगार रहो न रहो! अपने ही यकीन के साथ जीते हैं, बेचते हैं क्या, के खरीददार न रहो? ये एहसानों का धंधा बड़ा पुराना है,  खुदगर्ज़ी से तुम मददगार न रहो! किसी की ख़ातिर कुर्बानी फ़िज़ूल है, दिल-ओ-ईमान के दुकानदार न रहो! आसानी से आपको उस्ताद बना दे,  बाज़ारी तालीम के खरीददार न रहो! हर एक शख्श अपने तय रास्ते पर है, औरत है सिर्फ़ यूँ सिपहसालार न रहो! सही-गलत ही सिर्फ़ दो सच बचे हैं, ज़िंदगी के इतने तंग समझदार न रहो! मुक्तलिफ़ ज़मीन है सबके तज़ुर्बों की फ़क्त अपनी सोच के ज़मींदार न रहो!