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रिश्ते!

रिश्ते सारे नाप बन गए,  कैसे ये हम आप बन गए? कहने को सब साथ बन गए, गए तो खाली हाथ बन गए? लेनदेन से जाँच रहे सब, कैसे ताल्लुकात बन गए? अपनी ज़िद्द के पक्के सब, कितने इल्ज़ामात बन गए? हाथ खड़े कर दिए हमने, यूँ नामुमकिन बात बन गए! ख़ामोशी आवाज़ बन गई, और सब चुपचाप सुन गए! कैसे ये हालात बन गए? आप मेरे जज़्बात बन गए? न मानी बात बेमानी हुई, मानी क्यों इसबात बन गए? (मानी - accepted ; मानी - meaning; इसबात - certain, proof) नज़दीकी में जात बन गए, खून की घटिया बात बन गए

ये कैसे रिश्ते?

रि श्ते 'जरूर' होते हैं,  क्यों पर मजबूर होते हैं?  जितने नज़दीक हों,क्यों,  उतने मगरूर होते हैं?  रिश्ता मतलब साथ है  इज़्ज़त है, विश्वास है  फ़िर क्या इतना उकसाता है?  क्यों कोई हाथ उठाता है?  अब क्या रिश्ता रह जाता है? क्या सिखा रहे हैं रिश्ते,  समाज धर्म, व्यवस्था  "गर्व करो" जो जैसा जहां  सवाल की जगह,  कहां?  बड़ो की मानो  वो भी नतमस्तक होके परंपरा जानो, मानो  सीता पर शक  द्रौपदी पर बाज़ी,  काट दो नाक कान  अगर नहीं राज़ी  लगा दो इल्ज़ाम  "शूप्रणखा" वो कौन सी दुनिया होगी,  सब की जिसमें जगह होगी?  साथ ही साथी की वज़ह होगी  मोहब्बत इज़्जत से नापी जाएगी  ताकत सरताज़ नहीं होगी,  खुद को बनाने के लिए  दुसरे को तोड़ना नहीं होगा,  दुनिया के नाप से कोई  कम न होगा,  आज़ादी और क्या है?

क्या बात करें?

कोई भी आह दिल तक पहुंच जाए कैसे वो हालात करें, सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! वो दौड़ ही क्यों जिसमें सब पराये हैं, तेज़ रफ़्तार दुनिया और बहुत दूर एक दूसरे से आये हैं, चाल बदलें अपनी और नयी रफ़्तार करें! ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! बच्चों के हाथ क्यों हाथ से फ़िसलते हैं, जदीद* तकनीक है के मशीनों से संभलते हैं (*आधुनिक) बचपन से बात हो ऐसे कोई व्यवहार करें! ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! अगर सोच है अलग तो आप पराए हैं, रिश्तों को सब नए मायने आए हैं,  ख़बर दुनिया की ज़हर जिगर के पार करे! .....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! चल रहे हैं मीलों और अब भी बहुत दूर हैं, आप कहते हैं घर बैठे सो मजबूर हैं, कैसे दर्द मजलूमों के हमको चारागर* करें! (*Healer) ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! क़यामत है दौर और कोई नाखुदा* नहीं, (नाविक) मजबूत कदम हों खोखली दुआ नहीं वो आवाज़ जो सुकून दे, जिसका ऐतबार करें! ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें!

रिश्ते मैं तो हम आपके.....

रिश्ते ज़ंजीर है किसी को किसी को शमशीर हैं मज़ाक हैं किसी को किसी को पूड़ी खीर हैं किसी को मज़बूर करते हैं किसी को मजदूर किसी को चकनाचूर कोई फलता है,कोई पलता है सही रस्ते चलता है कोई घर से भाग निकलता है कोई इंसाँ से रखता है कोई इंसाँ से बचता है किसी को कुत्ता प्यारा है कोई घोड़े का चारा है कोई फूलों में रमता है कोई उड़ान भरता है बिन रिश्ते इंसान नहीं, जरुरत पर भगवान बनाता है मरे को शमशान बनाता है अपना काम आसान बनाता हैै मतलब का सामान बनाता है बुढ़ापे की लाठी घर की शोभा छाती का बोझा कलाई का धागा मस्त माल मख्खन जैसे गाल बाजारू खरीद दहेज़ के साथ मिली मुफ़्त चीज़ और रिश्ते खून के थाली में मिली नून के जी का जंजाल, खाल के बाल बोले सो सुनो कहे सो बनो, सपने बड़े चुनते हैं छोटे घुनते हैं रिश्ते आज़ाद करते हैं इरादों को बाज़ करते है कामयाबी को ताज करते हैं पीठ को हाथ करते हैं अकेले में बात करते हैं रिश्ते बांधते हैं रोकते हैं हर नए कदम को टोकते हैं पर काटते हैं, आपस में बाँटते हैं रिश्ते झगड़ते हैं, बिगड़ते हैं ...

और आप!

एक आप हैं,  आप दिख रहे हैं या कुछ दिखा रहे हैं,  कहते कुछ नहीं पर कुछ फ़र्मा रहे हैं! आप मुस्कराते हैं या सुबह को जगाते हैं, चलिये आज सूरज़ को भूल जाते हैं :-) नज़र छुपा रहे हैं या बचा रहे हैं , नज़दीकियों के अंदाज़ आ रहे हैं! और एक आप ये भी किसी का सच है, आप भी सचमुच! कितना आसान है, जो किया अगर चुपचुप! जो आप की नज़र में है, वही आज़ की खबर में है, क्या समझें बारीकियों को ध्यान जिनका असर में है! अटके हुए हैं आप अपनी ही तहरीरों में,  रंग दिखते नहीं आप को तस्वीरों में! क्या ये आप नहीं ? आप अपने जख्मों को रंग लगाते रहिये  असर होने के लिये एक आह काफ़ी नहीं! अकेले हैं आप ये सोच छोड़ दीजे, यूँ नज़रों पे इतना भरोसा न कीजे! और आप सब ! रिश्ता कुछ नहीं फ़िर भी वास्ता आप से है, मुसाफ़िर होने की कुछ ये भी तरकीबें हैं! कोशिशें आपकी निशान हो जाये, इरादे आपकी पहचान हो जायें, सफ़र मुबारक है आपका, बस मुश्किलें थोड़ी आसां हो जायें!

आसान काम!

जो मालुम है उस पर यकीन रहने दो! अपने सपनों को तुम हसीन रहने दो!! मुश्किलों को अपनी आसान रहने दो! जब तक मैं हुँ , मेरी जान रहने दो!! कब समझे है आईने अंजान रहने दो! अपनी आँखों में ही अपनी शान रहने दो!! मुझको मुझसे ही समझो , बात आसान रहने दो! मेरी गलतियों को तुम मेहमान रहने दो!! छू कर महसूस करो लगे जो दाम रहने दो! जिंदगी को अपनी छलकता जाम रहने दो !! चोट और भी हों , रस्ते का काम रहने दो ! मुझे अपने छालों का बाम रहने दो !!

अंदाज़ ए नज़र या नज़र अंदाज़ !

कहने को तो जहाँ है, फिर भी ना बाहर आये क्यों.. करीब सारे निशां है, गोया नजर न आये क्यों... खुद पर मुसलसल नजर है, कहे मोहब्बत कोई ... नज़दीक आने का अंजाम, खामियां ही नजर आये क्यों... हमारी शिकायत हमसे ही होती है बारहा... मुश्किल में मुश्किलें है, खुद को आसां बनाए क्यों... यूँ ही नहीं की हमको कोई शिकायत नहीं होती ... जो जख्म नजर नहीं आते उनको भला दिखाएँ क्यों... यूँ तो हमको भी शिकवे हैं छोटी-बड़ी बातों के, यूँ उनको सब मालूम है और हम बतायें क्या! हमारी भी खूबियां हैं  वो कहते बताएं क्या, दिल में दी है जगह अब सर पर बैठायें क्या! रोज किसी न किसी बात पर प्यार आता है, आदत सी पड़ गयी है, अब इसमें‌ बतायें क्या!! इरादे यतीम ना होंगे अज्ञात यकीं की जमीं पर.. बंजारे हों जब मिज़ाज़ के, सफ़र मुकां पर आये क्यों...