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करें तो करें क्या?

करें तो क्या करें? शर्म से मुँह छुपाएं या सिर्फ मास्क करें? भूख प्यास करें, उम्मीद आस करे , ठंडी आह भरें या लंबी सांस करें? सरकार निकम्मी है, कब एहसास करें? शिकवा शिकायत करें, या बस इबादत करें, हाथ जोड़ें या हाथ पर हाथ धरें? चीखें, चिल्लाएं,  भिखारी बनें या जनावर, सिर्फ़ लानत धरें? या गुस्से को धार करें? बच गए किसी तरह, किसी तरह गांव पहुंचे, टूटे हौंसले जोड़ें या छूटा जो सामान करें? कुछ समझ नहीं आया, कोई ख़बर नहीं, कोई मदद नहीं, फिर भी हाथ जोड़ें या सवाल सरकार करें मर गए बीच रस्ते, बेआबरू होकर, उनके पीछे छुटे बच्चे, माँ, बाप  करें तो क्या करें? आपका दिलासा, सहानुभूति, चिंता आग में घी का काम करे! आपने अपने आइनों से कब क्या सवाल करे?

ये कैसी सरकार!

आत्मनिर्भर मजदूर    घर से दूर, अपने पैरों चले हैं, सरकारी फैंसले हैं? ये कैसा सरकारी खेल है, कमजोर है वो फेल है? महंगी बड़ी रेल है, सवालों को जेल है? जाको मारे सरकारी नीती,  राख हवा में होई, कदम कदम चल मरेगा,  चाहे मदद जग होई! लोकतंत्र पर लॉकडाउन, ये कैसी सरकार हुई? मजलूमों से आँख फ़ेरती  क्यों ऐसी नाकार हुई? वादे ईरादे हैं क्या?  या सिर्फ़ बातें हैं? नीयत साफ़ नहीं,  एक यही सच बचा है! मज़बूरी को बिसात पर चाल बनाते हैं, बड़े बेगैरत हैं जो सरकार चलाते हैं! सरकार ने अपने को बचा कर रखा है, खुद से ही बस अच्छे दिन का वादा है!! मूरख सी सरकार है,  कुछ कहना बेकार है! भूखे को इज्ज़त नहीं,  हालात-ए-ज़ार है! चलिए कुछ दान करते हैं, ख़ुद को ज़रा महान करते हैं! सवाल पूछने का वक़्त नहीं, सर-आंखों सरकारी फरमान करते हैं!