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कशमकश कश्मीरियाँ

  Kashmir

365 दिन, कश्मीर बिन!

365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद? और आपको ज़िंदगी से कोई शिकायत? 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, देश में चलती राममंदिर की कवायत! 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, ये  लोकतंत्र पर भद्दा पैबंद! 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, TV पर देखा आपने, होकर तालाबंद! 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, और आपको अच्छे दिनों की ख़बर होगी? 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, फेक एनकाउंटर से आप बहुत खुश होंगे? 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, इस बात पर कब दिए जलाएंगे आप? 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, और आपके बच्चे क्या खेल रहे हैं?  आजकल?। 365 दिन कश्मीर कैद में है, नज़रबंद, आप क्या अब भी हिंदुत्व के गुलाम हैं?

नफ़रत के प्रकार !

नफ़रत का शिकार आप तब हैं जब आप भी नफ़रत करने लगें आप नफ़रत का शिकार हुए हैं? या नफ़रत के तलबगार हुए हैं? अगर आप भीड़ का हिस्सा बने तो सोचिए आपकी नफरत का माली कौन है? गुनाह हुए हैं तमाम आपके साथ, क्या आप किसी गुनाह के हथियार हुए हैं? चुप रहने से घुटन होती है, खुल कर हम कभी अपनी हैवानियत की बात नहीं करते। ज़ख्म ठीक भी हुए दर्द नहीं जाता, क्या आप बात करने को तैयार हुए हैं? धर्म और नीति राज बन कर आपको नफरती भक्त तो नहीं बना रही? नफ़रतों के दौर की कोई बात न करें, बस कहने को हम होशियार हुए हैं! कत्ल हुए मासूम किस वहशियत से, किस  हिदायत से इतने लाचार हुए हैं? धर्मगुरु भी हैं और राजनेता भी, जिम्मेदारी कोई क्यों नहीं लेता? मज़हब कम पड़े या इंसान सरचढे? जवाबदेही को सब बेकार हुए हैं!! अल्पसंख्यक क्यों हमेशा शिकार बनते हैं? जो कम है उसी को कमजोर करते हैं, उस्तरों के कैसे ये बाज़ार हुए हैं? बचपन हिंसा का शिकार हो तो उसका क्या असर होता है? बचपन के साथ कहाँ वक्त कुछ मिला, कौन से हैं खेल जो इंकार हुए हैं? हिंसा और नफरत हमें चोट ...

ख़ामोश, तानाशाही अभी जारी है!!

पूरी अवाम को गुनाहगार कर दिया, सत्ता ने ताकत को हथियार कर दिया, रोज लाखों की छाती पर मूंग दल रही है, घटिया मज़ाक है, जो संसद में शायरी चल रही है। बच्चे भी गुनहगार हैं, दादी भी गुनहगार हैं? किसी को कोई हक नहीं, आवाज़ कोई भी जेल की दीवार है? और बाकी मूल्क जैसे गूंगा है, जैसे कश्मीर कोई दूजा है, अपने से जुदा, अलग, उनसे हमें बस लेना है देना कुछ नहीं, हर इंसान को इंसान कहने की वज़ह नहीं, जो अपना नहीं उसका कोई सपना नहीं? क्या अब भी आपको ये सवाल है? कश्मीरियों को कश्मीर क्यों चाहिए? https://m.timesofindia.com/entertainment/hindi/bollywood/news/zaira-wasim-kashmiris-continue-to-exist-and-suffer-in-a-world-where-it-is-so-easy-to-place-restrictions/amp_articleshow/73929642.cms

मुर्दा जानशीन!

आग जल रही है लाखों सीनों में, गश्त की कैद में सूखे पसीनों से! मन चाहा देखने की इजाज़त नहीं है, 9 हफ्तों से शुक्र की इबादत नहीं है? मुश्किल सवालों की आदत नहीं है! हामी के बाज़ार में बगावत नहीं है! सवाल सारे कवायत हैं रियासत की रवायत हैं, फ़रमान ही भगवान है! ख़बरदार, ये जुर्रत,  क्या औकात! गले पर सरकारी हाथ! ट्विटर पर गाली, न्यूज़ सीरियल सवाली, भीड़ की हलाली, धर्मगुरु दलाली! व्हाट्सएप के खेत हैं डर के बीज नफ़रत के पेड़, मज़हबी भीड़, भेड़! कश्मीर सिर्फ जमीन, सुंदर बेहतरीन, 80 लाख कब्र, ज़िंदा,? करोड़ों जोशीले मुर्दा, जानशीन?

काम तमाम!

मर्ज़ी के अपनी बेईमान हो गए, आज से हम गुलाम हो गए! जमीन अभी भी अपनी ही है, ये क्या हुआ के मेहमान हो गए! सब कहते हैं कि जमहूरियत है, क्यों अपनी कह बदनाम हो गए? अपना कहा था सो आम हो गए अब सारे उनके वादे  हराम हो गए! वक्त के साथ नीयत बिगड़ती रही, उनकी जरूरत को क़त्लेआम हो गए! अगवा कर लिया सब अवाम  को गुनाह सारे सियासी काम हो गए! दो में बाँट दिया सरकारी फ़रमान ने, एक श्रीराम हुए, दूसरे 'हे राम' हो गए!

श्रदांजलि लोकतंत्र!

हद है, बेहद है, बद से बदतर है! पैर बेसिर है, कलम सर है, तलवे चटे हुए, जहन बंटे हुए, चाल भेड़ है, भक्ति भेष है, खाल हिरन, चाल भेड़िया कार सर है, न्यूज़ टर्र टर्र है कुआँ खाई भाई भाई नगरी अंधेर, उल्लू सीधा घड़े चिकने, तूती नक्कार, डूबते तिनके, ढाक के तीन, तीन तेरह कोरा काम न टस न मस बेईमान मेहमान मान न मान, छूरी मुँह में, राम बगल, मौत बिगुल, धान बाईस पसेरी! माथा ठनका?

भागते रहो!!

चारों तरफ पहरा है, बंदोबस्त, जबरजस्त एक पूरे मुल्क की ताकत, कर रही है हिफाज़त? चौबीसों चौकन्ने, तीसों होशियार, क्या मज़ाल किसी की, ख़बरदार! सुई पटक सन्नाटा, बेहिसाब असला, कहाँ कोई मसला? इसे कहते है ताकत, लोकशाही की, चप्पा चप्पा मुस्तैद, सबका साथ, सबका हिसाब! कश्मीर! एक जेल! कश्मीरियों के लिए! वाह! भारत सरकार! वाह! जहां चाह, वहां आह! मासूमियत बेपनाह!

बचपन और कश्मीर?

रूह कांप जाती है, ये सोचकर के अगर मेरा बचपन कश्मीर होता? शायद, मेरा आज कोई और शरीर होता! पैलेट से सुसज्जित, मेरा चेहरा होता, आख़िर, पत्थर मैंने भी उठाए हैं, फेंके भी हैं, बड़ा मासूम था मैं? गुस्सा तो था नहीं, न कोई परेशानी, बस कुछ होने की आसानी, जैसे एक खेल था, चलती हुई बस, एक पत्थर, सरकारी मुलाज़िमों की बस्ती, सुरक्षित हस्ती! आज मैं शांति-अमन हूँ, और वो बच्चे? जिनकी लोरी कदमताल है, और तलाशी, सुबह की लाली? जिनसे सवाल बन्दूकें करती हैं, और ज़वाब कोई भी सही नहीं! उनके हाथ के पत्थर क्या होंगे? सवाल? ज़वाब? बयान? मलाल? ख़याल?

अखंड नीयत!

पहरा तो गहरा है, हर कोने पर शक खड़ा है, हर गली में बदनियती पहरा देती है, कितना भी नेकनियत निकलिए, खौफ़ गश्त लगा रहा है, बदसलूकी रोज़ का मौसम बनी है, हाथ उठते है, और गरेबाँ हो जाते हैं, वो कहाँ मर्द औरत में फ़र्क लाते है? आखिर अखंड भारत के नुमाइंदे है, शायद ये संविधान के कायदे हैं, बराबरी!

जन्नत कहाँ?

सुना है सब आतंकी हैं, इस जगह! हर एक शख़्श! बच्चा, बूढ़ा, आदमी औरत, और एल जी बी टी क्यू!? क्यूँ?? यहाँ की हवा में शायद, कोई बात हो! क्यों? कश्मीर! वही जगह दुनिया की, "अगर जन्नत है तो यहीं, यहीं, यहीं है" कश्मीरी भी वही हैं? वादियां भी वही, वही बर्फ, वही चिनार, वही डल, वही हज़रतबल! फिर बदला क्या है? हवा में, क्यों बारूद घुल गया है? सबकी नसों में कड़वाहट घोलने वाला! ये ज़हर कब मिल गया है? ये ज़हर आया कहाँ से? कौन है जो बदलाव नहीं बदला बोलता है?

पत्थर और बंदूक !

पत्थर और बंदूक की बातचीत पत्थर - (खामोश) बंदूक - (तड़, तड़, तड़....) पत्थर - ...... बंदूक - हम कानून हैं? पत्थर - हम मासूम हैं! बंदूक - तड़ तड़ तड़ पत्थर - हम ज़ज़्बा हैं! बंदूक - हम कब्ज़ा हैं!! पत्थर - क्यों, क्या, कैसे? बंदूक - तड़ तड़ तड़ पत्थर - अब हम चुप नहीं रहेंगे! बंदूक - हा हा हा....तड़ तड़ तड़ बंदूक - हम इंसाफ हैं पत्थर - इसलिए तुम्हें हर खून माफ़ है? बंदूक - ख़बरदार पत्थर - मौत से? या ज़िन्दगी से? पत्थर - आज़ादी बंदूक - घुटने टेको...तड़ तड़ तड़ बंदूक - तुम आतंकवादी पत्थर - ज़मीं है हमारी! पत्थर - क्यों बलात्कार? बंदूक - हमारे सच, हमारी सरकार पत्थर - दो ही मौसम हैं यहां ,             बंद और न बंद! बंदूक - ज़मीन सुंदर है, और लोग टाट-पैबंद पत्थर - हमारी चीखें हैं , बंदूक -  पैलेट आपका मरहम पत्थर - चुप नहीं करा सकते! बंदूक - "आतंकी है" तड़ तड़ तड़ पत्थर - फेक एनकाउंटर  बंदूक - हमारा तंत्र, सच हमारा पत्थर - कश्मीर हमारा है! बंदूक - जिसकी ताकत उसकी जमीं(लाठी की भैंस) पत्थर - कश्मीर...

आंखों में, आंखों से...

रोज  जीते हैं, और मरते भी रोज़ हैं, अपनी ही आंखों में, आंखों से, आँख मिलाएं कैसे? सब जान कर, देख कर, न माने कैसे, और मान जाएं कैसे? अपनी ही आंखों में, आंखों से, आँख मिलाएं कैसे? जो 'है', वो 'था' अपने अकेले हैं और सब के साथ, क्या है हमारे हाथ? खाली हैं, तो क्या फैला दें? कोई वज़ह तो हो, खुद की पीठ ही सहला लें? मजबूर हैं पर मंज़ूर नहीं हैं, अपनी ही आंखों में, आंखों से, आँख मिलाएं कैसे? अपनी ही आह कब तक सुनें, कौन से दर्द चुनें, अपने या अपनों के? अपनी ही आंखों में, आंखों से, आँख मिलाएं कैसे? मुमकिनियत,  रवैया है या लतीफ़ा हौंसला बढाएं किसका किसकी पीठ सहलाएं? अपनी ही आंखों में, आंखों से, आँख कैसे मिलाएं? क्या तबीयत,  क्या तर्बीयत,  क्या हुकूक, क्या हक़ीकत,  हमारी वज़ा क्या है ओ रज़ा क्या है? बताएं? किसको,  कैसे  ?   अपनी ही आंखों में, आंखों से, आँख मिलाएं कैसे? टूटे काँच, बंद दरवाजे, गुमशुदा, साँसें या लाशें? हर कदम पहरा, शक गहरा, आईनों पर हरसू पहरा! अपनी ही आंखों में, आंखों से, आँख ...

नाम - लड़की

नाम - लड़की जगह - कश्मीर  उम्र - कोई ठिकाना नहीं देश - घर के बाहर खड़े AK-47 (या वैसा ही कुछ) आर्मी वालों से पूछ कर बताउं?  जन्म दिवस - रोज़! अगर जिंदा बच गए तो तालीम - झुठी, गुमराह करने वाली (स्कूल की)      -----  144, कर्फ्यू, तलाशी, ताकत, बेइज्जती,  शौक - इज्ज़त, आज़ादी, आईने से आँख मिलाना घर में कौन कौन है - है या था? मौज़ूद या मिसिंग?  दोस्त - ज़िंदा या मुर्दा? स्कूल में या अस्पताल में? कोई सपना - 'दिन का?' - रात में चैन की नींद                    'रात का?' - "कश्मीर" आप किस बात से मुतासिर हैं, प्रेरित हैं?  -  कश्मीरियत पाँच साल बाद आप अपने आप को  ? पाँच साल? पहले दे दीजिए, पाँच साल? एक दिन ही दे दीजिए?

कश्मीरियत!

मुस्करा के अपने दर्द बयां करते हैं, यूँ लोग अपनी ज़िंदगी मकाँ करते हैं। खींच ली है जमीं पैर नीचे से, हम हैं के फिर भी सफ़र करते हैं! मुश्किल में मदद की जरूरत पड़ती है, हम मुश्किल में भी, सबकी मदद करते हैं! फौज को फ़ज़ा कर दिया है कश्मीर की, अब ज़ज़्बे से हम ये आबोहवा करते हैं! कश्मीर जग़ह नहीं सिर्फ हमारी वज़ह है, यूँही नहीं ये बात हम खूँ से बयां करते हैं! कश्मीर आइये आपको कश्मीरियत मिलेगी, अपनी मुश्किलों को हम नहीं दुकां करते हैं!

कश्मीर, कश्मीरियत और खामोश सवाल!

कश्मीर, मुस्कराते लोग, हँसते बच्चे, बर्फीले पहाड़, पाक-साफ़ पानी इन्तहां खूबसूरत! कश्मीरियत, जज़्बा         इरादा,         हाथ में हाथ, मुश्किल में साथ, दर्द में डूबे हालात, मुस्कराते हमसे बात, एक सवाल सिर्फ, "आप ही बताएं..." हम क्या बताएं?     

क्या खेल खेलें कश्मीर के बच्चे?

आज बहुत मजबूर हूँ, कश्मीर से बहुत दूर हूँ, जैसे पेड़ खजूर हूँ, याद आ रहे हैं वो दिन, वो लोग जो इंसान थे, हमारी तरह, तुम्हारी तरह एक उम्दा मेज़बान की तरह, साथ हंसते थे, हम परेशान न हो, इसके लिए परेशां रहते थे, जब उनके साथ "खेल से मेल" किया, तो सब वैसे ही हँसे जोर जोर से, जैसे लोग बनारस में हँसे थे, या कंदमाल में, दिल्ली में, पुणे में, जुबा में, येंगॉन में पर उसके बाद जो बात हुई, तब उनके दर्द से मुलाक़ात हुई, "हमारा बचपन अँधेरे को बली था" अब हम अपने बच्चों को हंसाएंगे, वो हमारे शुक्रगुजार हुए, और हम, अपनी नज़रों में ज़रा कम गुनाहगार हुए, कश्मीर भारत को खूबसूरत है, और सारे देशभक्त, उसको कोठे पर बिठाना चाहते हैं, एक जगह है सबके लिए, जहां से डॉलर्स आते हैं, पाउंड, यूरो, और रूपये भी, कौन छोड़ता है ऐसे माल को, हर साल जो नयी हो जाती है, वर्जिन तैयार नथ उतरवाने को, कौन देखता हैं कि वहां इंसान हैं, उनके दिल हैं, उनकी जान है, उनके बच्चे हैं जो सरकार की गोली कुर्बान हैं! सफर ज़ारी था, आने जाने में, कश्मीरी दोस्त हमको लगे जगहों के बारे बताने...