कोई भी एक पहचान, हमें अधूरा करती है, हवा, पानी, राख, मिट्टी, लाखों ख़्वाब, रंग जाने पहचाने, रिश्ते, माने न माने वो सब जो कभी हाथ थामे, कभी एहसास बन, कभी प्यास बन, हमारे रास्तों के हमसफ़र हैं, बिन उनके, हम कम हैं, हम एक हैं नहीं, पूरे अधूरे हैं, अधूरे पूरे हैं!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।