खुद से दूर जाने की कोशिश तमाम की मैंने जाने अपनी कितनी नींदे हराम की, किसको नज़र आये चेहरे के रेगिस्थान क्यूँ अपनी सारी मुस्कराहट शमशान की? हमसफ़र, साथ देने के शौक तन्हा कर गए हाथ आये फ़ासले जब भी, राय कोई आम की शराफत के सब सौदाई, इतनी इज्ज़त-अफज़ाई कहाँ खरीददार कोई, जो दुकान-ए-ईमान की बंजर जमीन ने कितने इरादे चट्टान किये यूँ माथे की सारी परेशानी पीक-ए-पान की चलते रहे, यूँ अपने ही तूफानों के छोर थाम हमने कहाँ कभी अपनी, मुश्किल आसान की
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।