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उम्दा सफ़र!

  बड़े उम्दा से ये सफ़र रहे हैं, कुछ ऐसे अपने गुज़र रहे हैं! मुश्किल बस एक नज़रिया है, कुछ ऐसे अपने हश्र रहे हैं!! कौन नहीं हैं यहां गुनहगार? पर कहां अपने कोई जिक्र रहे हैं! सब कुछ मुमकिन हैं सुनते हैं, यूं जो दुनिया बदल रहे हैं! शराफत मजहब हुई जाती है, कुछ ऐसे उनके फक्र रहे हैं! उसूल ऐसे की जंग मुमकिन है, पर ऐसे हम कुछ लचर रहे हैं! दुनिया रास नहीं आती फिर भी, कुछ ऐसे अपने बसर रहे हैं! सब हो जायेंगे इंसान एक दिन, पर हम कहां इतना ठहर रहे हैं! कामयाबी की गुलामी नशा है, कुछ ऐसे ही सब बहक रहे हैं! अज्ञात हैं, रिश्ते फिर भी कायम से, कुछ ऐसे अपने असर रहे हैं!

इंसानी विधाएं!

दुनिया बहुत भरमाए है,  तस्वीर मन लुभाए है,  मन बहुत बहकाए है,  जिम्मेदार कौन हो? इंसान अब भी मूरख है,  नीयत से धूरत है,  काट, छाँट, बाँट,  ये तरक्की की सूरत है! मौत के डर से ज़िंदगी निचोड़ते हैं,  सारा रस निकालने को,  लाश बनने को,  कहां कोइ कसर छोड़ते हैं! काबिल हैं तमाम बातों के,  लिख्खा है सौ किताबों में,  समझ को बदल ताकत में,  बने लातों के भूत बातों से!  दूर दूर तक के सफ़र हैं,  मुमकिन सोच के असर हैं,  फ़िर क्यों 'मैं मानव' में सिमटे हैं?  किस सवाल के कम हैं? हर शुरुवात मोहब्बत है,  फ़िर रिश्ता बनती है,  फ़िर सौदे की बातें सब,  ये रास्ते दुनिया चुनती है! दर्द जो हमारे हैं,  बडे ही हमको प्यारे हैं,  लाखों कत्ल कर कुदरत के,  कहते, 'वाह!क्या नज़ारे हैं'! फ़िर भी ये नहीं के हम इंसान कम हैं,  या नेक होने को अरमान कम हैं,  पर अपनों से ही सारी लडाई है,  उधडें वही जो बुनाई है, बनाई है!

दुआ सलाम!

रास्ते में हम मुस्कराए तो वो सलाम करते हैं, आसानी से एक दूसरे को इंसान करते हैं! फेसबुक पर ज़रा बहस हुई कि इतने हैरान हो गए, आसानी से अपनों को शैतान करते हैं! टीवी पर कह दी दो मन लुभावन बातें जयहिंद बोल, ज़रा से मेकअप से उनको भगवान करते हैं! न्यूज़ में दे रहे है ख़बर, डर कर, ज़ेब भर कर, कितनी झूठी खबरों को विधान करते हैं? भक्ति में धर्म के ठेकेदार बन कर दलाल बैठे हैं, वो कहें तो आप मस्ज़िद शमशान करते हैं? लॉकडाउन हुआ घर बैठ सब राम-किशन गान करते हैं, गरीब मजदूर हथेली में जान करते हैं? कोरोना क्या इतना डरा दिया कि अब लाइन करते हैं? अछूत बने हैं और झूठी शान करते हैं? पी एम केयर नॉट राहत के काम को भी वो दुकान करते हैं? अनमोल झूठ के आप कितने दाम करते हैं?

इंसान समझदार!

सुरज की लाली, बादल काली, और इसी में छुपी कहीं हरियाली! और भी रंग हैं पहचाने से, जो हैं, और वो भी जो नज़र नहीं आते, पर आपको सबूत चाहिए, दुनिया अपनी मजबूत चाहिए? पहले जंगल को काट दिया, फिर समंदर को बांट दिया, आसमान में तारे खोजते हैं, फिर पांच सितारा, वातानुकूलित, कमरों में मुट्ठी भर पानी की बोतल खोलते हैं, एक्सपर्ट, उस्ताद, विशेषज्ञ बोलते हैं, हम समझ गए हैं, सिद्द किया है इंसान सबसे समझदार प्राणी है! आप भी समझ गए होंगे? आखिर आप भी इंसान हैं? आख़िर वेदों में लिखा है, ज्ञान से ही मुक्ति है! जल्दी ही!!

रंग और रंगत!

रंग क्या हैं? नतीजा हैं या वज़ह हैं, बने हैं या बनाए हैं? आख़िर कहाँ से आए हैं? करिश्मा हैं या कैरिसमा क्या अच्छे बुरे हैं? हल्के-गहरे हैं! कम-ज्यादा? अकेले चलते हैं या साथ, रंगों में कुछ अकेला भी होता है क्या? ख़ुद में पूरा, कोई कसर नहीं, दूसरे का रत्ती असर नहीं? पीला, थोड़ा हरा भी होता है? नारंगी ज़रा सुनहरा? क्या लगता है? रंगों की हमेशा लड़ाई चलती होगी? एक दूसरे पर हावी होने को? खासतौर पर सूरज डूबते? शायद उनका दंगा होता होगा, खुली छूट, मार काट? तभी शायद अंधेरा आता है? और बेशर्मी देखो! अगली सुबह फिर शुरू, और बादल आएं तो मत पूछो पर्दे के पीछे से क्या क़त्लेआम, अक्सर लगता है, भगवा ने किया सबका काम तमाम सब भगवा, बाकी सब भाग गया? पर रात! कहाँ कभी पूरी काली होती है? आख़िर चांदनी का ख़ालिस, गहरा सफेद, उसी घुप्प काले के साथ है, क्या लगता है क्या उनके जज़्बात हैं? सदियों से चलती लड़ाई? कभी भी न रात पूरी काली हो पाई न ही चांदनी, काले के मुँह रोशनी पोत पाई! कहीं ऐसा तो नहीं सारे रंग मिले हैं? चाल चलते, हम...

एक सुबह डिकोया!

एक सुबह डिकोया, (जगह का नाम है, डिक्शनरी का क्या काम😊) हुआ कुछ नहीं , और फिर भी, रंग सारे, लगे हुए हैं ! खिले हुए, खुले हुए कहाँ से लाते हैं इतना जोश , इतनी उम्मीद? वो भी चारों तरफ   नकारा इंसानों से घिरे होकर, काटते, छांटते, बाँटते, कचरा फैलाते? शायद कोई अहम नहीं  है, कोई और संभालेगा, ये वहम नहीं है! एक एक बूंद,   एक एक पत्ती हर एक फूल, खिला, मुरझाया, गिरा जानता है अपनी ख़ासियत! पूरे भरोसे, कि दुनिया में उसकी जगह है, यही उसकी वजह है! गुरुर किस बात का, किसी की किसी पर विजय नहीं है! (डिकोया, हैटन, श्रीलंका में है)

अखंड नीयत!

पहरा तो गहरा है, हर कोने पर शक खड़ा है, हर गली में बदनियती पहरा देती है, कितना भी नेकनियत निकलिए, खौफ़ गश्त लगा रहा है, बदसलूकी रोज़ का मौसम बनी है, हाथ उठते है, और गरेबाँ हो जाते हैं, वो कहाँ मर्द औरत में फ़र्क लाते है? आखिर अखंड भारत के नुमाइंदे है, शायद ये संविधान के कायदे हैं, बराबरी!

वक़्त का करतब!

 सब साथ है, तजुर्बों से कहां ज़ुदा जज़्बात हैं, गहराई अच्छी है, गर  याद रहे जमीन, वो भी उतनी ही सच्ची है, समंदर, पेड़, पानी, रोशनी सूरज अलग अलग हैं, पर साथ आकर सार्थक! मुकम्मल!  सोचिए आप, क्या हैं, इंसान, प्राणी, कुदरत, या फक्त वक्त का करतब?

मशकूर मुसाफ़िर

इंसान होने का सफ़र, और उसका असर हर ज़ज्ब करती नज़र से हर मुस्कराहट से खुले दिल और फ़ैली हुई बाँहों से खेल है ये बच्चों का कहने को कुछ नहीं करना ही उनका कहना है, कुछ उम्मीद से मेल खायेंगे हमारे इरादे और हरकतें, ओ' इस के लिए हम मशकूर हैं! We travel to become human and human we become with every glance with every smile with open heart  and welcome arms It is indeed a child’s play for they need not say they show the way believing we may Unite in our intention and action, for that we are grateful

गुस्सा सवालिए!

मैं उदास हुँ हताश नहीं, गुस्सा पाल नहीं रहा, सवाल रहा हूँ, मैं हाल हूँ या हालात? खबरों में खुद से होतीं नहीं मुलाकात, नफ़रत का हर तरफ़ बवाल, कोई मज़हब जल रहा है, और कोई धर्म जला रहा है! जो ज्यादा है वो भीड़ हैं, जो कम हैं वो कम पड़ रहे हैं! इंसान अब इंसानियत से लड़ रहे हैं! और वातानुकूलित सच वालों को यकीन है, के इस दौर में हम आगे बढ़ रहे हैं!

सच सुबह!

सब खुश हैं, अपनी अपनी जगह पर अपनी अपनी जगह से, फ़िलहाल, इस पल में और फिर सब बदल जायेगा और फिर भी सब खुश हैं, अपनी अपनी जगह पर अपनी अपनी जगह से सूरज बादल आसमान जमीं सारा निसर्ग, सब साथ हैं, अपनी अपनी जगह भी, और उस के साथ बदलते न अटके हैं , न भटके हैं न कोई चिन्ता है, न कोई इंसिक्युरिटी, न खींच-तान, न अपनी जगह का दबदबा, पानी पानी, हवा हवा सब चल रहा है, सब बदल रहा है, बदलने की कोशिश नहीं, क्योंकि बदलना ही ज़िन्दगी है, कोशिश तब जब डर हो, अगर मगर हो, खम्बों में घर हो, और ये गुमाँ कि कुछ मेरा है, "मैं" मालिक, कितनी इंसानों जैसी बात है, आप ही कहिए, इंसान होना कौन बड़ी बात है!??