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निल बटे सन्नाटा!

ज़िंद गी क्या है,  आख़िरकार? कोई वज़ह है? या बस साँसों के चलने की एक जगह है? भय की वजह है? लॉक डाउन, सोशल डिस्टेंसिंग कल के लिए बचने को? हक़ीकत सपने में बदल रहे हैं! क्यों उलटी चाल चल रहे हैं? बच्चे खेलें नहीं? भूखे काम न करें? घर अंदर हिंसा नाकाम न करें? फसल के दाम न करें? मरना कोई नयी बात है? या बस मर्द ज़ज्बात हैं? बीमारी को हराना है? किसी कीमत? तरक्क़ी सदियों की, सभ्यता विकास की, विवेक की, एहसास की, आभास की? निल बट्टे सन्नाटा? घर बैठ जाओ, किसी से मिलो नहीं, सुबह चलो नहीं? अरबों किताबें, लाखों गुणीं बातें, सौ -हज़ार भगवान, फिर भी बात मौत की सब काम तमाम?

बेकल मन!

मैं उदास हूँ, कल था, आज हूँ, आस हूँ, प्यास हूँ, उम्मीद से हताश हूँ, मैं ख़ास हूँ, फिर भी, अपने ही सवालों से बदहवास हूँ, अकेला, अपने साथ हूँ, और भी हैं, बात करने को, पर आखिरकार दिन लंबे हैं और रात, बोलती है, और न जाने कैसे, दिलोदिमाग  के सारे अंधेरे कोनों में गूंज उठती है, उनका सामना करती अपनी ही मुस्कराहटों से थक चुका हूँ! सच चुका हूं! अपनी कामयाबी से,  जो मेरे चारों तरफ है, सामान बनकर, जेब में पड़ीं दीवारों पर जड़ी, लाइफ़ साइज़ तस्वीरें,  मुझे ही क्यों छोटा करती हैं? कितनी चमक है मेरी, मन बहलाती कभी मुझे ही झुठलाती, आगे क्या है? मेरी क्या वज़ह है? मेरी क्या जगह है? सपने, जो मैंने पाले हैं, दिल पर उसी के छाले हैं! अपनी ही मुस्कराहट से उदास हूँ, लगता है अपने पास हूँ, और दूर तक रास्ता नहीं कोई, इसलिए चलता हूँ! बहुत उलझाते हैं ख़याल, सवाल, इसलिए निकलता हूँ! यही एक रास्ता दिखता है, जो मुक़म्मल है! इसमें कहाँ कोई कल है, आज मन बड़ा बेकल है! चल!

चलें, क्या चलता है?

चल रहे हैं, बस! चल रहे हैं, पैरों पर जो गल रहे हैं, बदल रही है दुनिया संभल रही है दुनिया और हम बिखर रहे हैं, टूट रहे हैं, साथ, हाथ छूट रहे हैं! सरकारी फरमान और डंडे उम्मीद लूट रहे हैं, और गरिमा, इज्ज़त! अपनी ही नज़रों से फिसल रहे हैं, भूख की आग में जल रहे हैं और चल रहे हैं  सबके काम, घर बैठे! फ़ैंसले  रोज़ बदल रहे हैं! मर्ज़ी किस की  चल रही है? और मर्ज़  किस को  चला रहा है? मीलों, कोसों,  पहुँच रहे हैं  कितने? मरते,  क्या ने करते क्या किया ? किसी ने? सरकार? समाज? सभ्यता? सब चल रही है,  दुनिया बदल रही है, या नहीं? क्या बताएं,  हम चल रहे हैं, अभी भी, ज़िंदगी की तरफ़ मिल जाए  शायद,  मौत, अपनी गली- गांव, जहां हमारा  नाम हो, अनजान नहीं, पहचान सड़क किनारे, बेचारे, मजदूर, मजबूर माइग्रेंट, बेघर, बेकार, सरकार, और हम एक संख्या! जिसकी गिनती नहीं!

मौत की दुकानदारी

मौत ले लो मौत, जो ख़रीदे उसका भी भला, जो बेचे उसका भी भला, जो मरे उसको दफ़ना-जला! मौत सरकारी भी है और आतंकी भी, व्यापम भी है और उरी भी, भारत भी है और कश्मीरी भी, फांसी का फंदा है, किसी को धंद्या है! मौत एक बेनामी गाय है, ताकत के हाथों एक राय है! किसी के लिए खर्चा है, किसी के चाय की चर्चा है! किसी की मौत गुस्सा किसी की मौत जूनून किसी की मौत आतंक किसी की जूनून, कोई खुनी, कोई आतंकी कोई देशभक्त, किसी का मारना बहादुरी, किसी का कायरी, किसी को वीरगति, किसी को कुत्ते की किसी की मौत मज़हब किसी की जात किसी का बदला, किसी पर हमला...... ....... फिर भी हम इंसान हैं, जानवरो से अलग, कहने को बेहतर, लगे हर लम्हा इस धरती को करने में बदतर! तरक्की तहज़ीब मुबारक हो!

जिंदगी साली मौत की घरवाली

हम को ही हम से छीनता है ये ज़िन्दगी का कमीनापन हैं! जिंदगी पर मेरे बड़े एहसान हैं, कैंसर के बदले मुस्कराहटें दी हैं! जीने का और बहुत मन है सिगरेट जैसी बड़ी बुरी लत है! हमें नहीं लड़नी कोई भी लड़ाई जिन्दगी अखाड़ा है ये बात पहले नहीं बतायी! हाँ नहीं तो! मौत कितनी पेटू,कितनी अघोरी है, तमाम ज़िन्दगी सूत के भी भूखी है! ज़िंदगी हाथ धो के पीछे पड़ती है, मौत से मिलीजुली साज़िश लगती है जब देखो बीमारी परस देती है ज़िन्दगी बड़ी बेगैरत मेज़बान है ज़िंदगी मौत के बीच इंसाँ फुटबॉल है, एक ने किक किया दूसरी तरफ गोल है! कहते हैं शरीर बस आत्मा का खोल है, पर मूरख आत्मा क्या जाने, बर्फी चौकोर लड्डू गोल है? कहते हैं आत्मा अमर शरीर नशवर है बेईमान सप्लायर है अगर घटिया घर है? ज़िन्दगी साली मौत की घरवाली निकली, निकला मतलब तो मुँ पलट के चल दी!! (उन जुझारुओं की झुंझलाहट को समर्पित जिन्हें अपनी हिम्मत और लगन केंसर जैसी फ़ालतू बीमारियों से लड़ने और उनके रस्ते अड़ने में लगानी पड़ती है)

एक सफ़र मुसाफ़िर होने का!

क्या मैं तैयार हूँ , जाने को , या फ़सा हूँ , अपनी जिंदगी भुनाने को , हाथ आई चीज़ कौन छोड़े , वो भी मुफ़्त की , बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं , आज़ - कल बड़ी खुशी से खो रहे हैं हालत पतली है , अपने सर न आये , हो कहीं भी पेशी , हो जायेंगे खड़े सर झुकाये! पर वो दिन किस ने देखा है? अभी तो बस इकट्ठे कर लो , दिन पे दिन , साल पे साल , और उपर से ऐंठ कि उम्र बड़ी है , आपको देख कर चली घड़ी है , पर सच की किसको पड़ी है , सब अपनी मंज़िलों के बीमार हैं , क्या मज़ाल कोई कह दे कि जाने को तैयार हैं , सारी मेहनत खुद को बहकाने की , खुदा आपको लंबी उम्र दराज़ करे , जुग - जुग जियो , साल कि दिन हों पचास हज़ार , क्यों नहीं कोई दुआ देता कि आप कि मौत आप को इंतज़ार न कराये , और बोले भी कौन क्योंकि मौत बदनाम है , बेवज़ह , अगर सोचें तो , सच्ची है , ईमानदार है , और सच कहें तो यही है एक जिसको जिंदगी से सच्चा प्यार है , कभी साथ नहीं छोड़ती , मुँह नहीं मोड़ती , खैर जाने दीजिये ,  बात जिंदगी और मौत की नहीं , हमारी है , मेरी है , ...

स्वर्ग सिधार!

आज फिर कोई मर गया! क्या हुआ? किराये का था घर, गया! सादा सा था सच क्यॊं सर गया हकीकत आपकी या कोई गैर है? पसंद आई तो अपनी नहीं तो बैर है? सच बुनियाद है! आपकी ही इबादत  आपकी फ़रियाद है, ये कौन सा हिसाब है भरोसा, यकीं, आमीन कब से सौदा बन गया? आप के गम से सवाल नहीं हैं, पर आँसू समंदर की बूँद हैं, उनका दरिया क्यॊं? सफर जिनका था मुकम्मल हुआ, आज आपका है, कल, कल हुआ!  (मौत की कुछ खबरें और उनसे होती व्यथा को देखकर)