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यकीं यूँ कि. . . !

वो भी अज़नबी था और तू भी अज़नबी है, तख्त पलटा भी है या ये झूठा यकीं है? यकीं का खुदा कौन हो, यकीं को जमीं कौन हो अज़नबी का यकीं करें फ़िर अज़नबी कौन हो? तमाम यकीं है और युँ ही तमाम होते हैं, आँखें बंद है और उम्मीदों पे जवाँ होते है! तख्त की बात करके क्यों अज़नबी करते हैं, दिल में रखिये दिल का ही यकीं करते हैं! अपने पर ही यकीं रखिये लंबे साथ आयेगा, पैर फ़िसले भी तो दूसरे का नाम नहीं आयेगा! इतना कीजे यकीं कि उसको भी आ जाये लड़खड़ाते पैरों को जैसे जमीन आ जाये! रंग आसमां के जमीं के, थोड़े कुछ आपके यकीं के नज़र बायें करिये ज़रा, रंग और भी हैं जिंदगी के! अब ये ना कहिये कि बेवजह नुक्ताचीनि करते हैं, नमक आपका है, हम बस जरा नमकीं करते हैं!

आईये ! / The Invitation!

मुझे मत बताओ कि जिंदगी कैसे कटती है  ये बताओ कि अंदर से आवाज़ क्या आती है, और क्या वो सपने देखने की हिम्मत तुम में है, जो तुम्हें अपने दिल की तड़प तक ले जायें?  मुझे अपनी उम्र कि लंबाई नहीं बताओ, ये कहो कि मुरख बनने का जोखिम उठा सकते हो? प्यार के लिये, सपनॊं के लिये, जिंदगी जीने के रोमांच के लिये!  क्या फ़रक पड़ता है कि तुम्हारे ग्रहॊं की क्या दशा है ये कहो कि, 'अपनी दुखती रग' पर तुम्हारा हाथ है क्या? जिंदगी की ठोकरॊं ने तुम्हे खुलना सिखाया है? या आने वाले जख्मॊं के ड़र से तुम ने अपनी पीठ फ़ेर ली है? जिंदगी से!  जरा ये बताओ कि दर्द को, मेरे या तुम्हारे, बिना कांटे, छांटे, छुपाए, निपटाये, क्या तुम अपने साथ रख सकती हो? जरा सुनूँ, क्या तुम आनंदित हो, मेरे या तुम्हारे लिये! और क्या झुम सकते हो ऎसी दीवानगी से, कि तुम्हारे हाथ-पैर के छोर हो जायें भाव-भिवोर बिन संभले, बिन समझे, बिन जाने, कि इंसा होने कि हदें होती हैं!  तुम जो कहानी मुझे सुना रहे हो वो सच हो न हो, ये कहो कि खुद का सच होने के लिये, क्या किसी और की नाउम्मीदगी बन सकते हो, और अपनी अंतर...

बदलते लम्हे!

छटपटाते लफ्ज़, जब हलक से निकलते हैं, चहक जाते हैं, महक जाते हैं, कभी बहक जाते हैं, कुछ असर होते हैं, कुछ कसर रहते हैं आज़ादी के ऐसे ही सफ़र रहते हैं! उम्मीद रास्तों से,  सफ़र को मंज़ूर कहाँ हैं, अधूरे रहे मुसाफ़िर,  और हर ओर मकां हैं! अरमानों की आग पर होंसलों को सेंकिये, कोशिशों के हथौड़े, जब जोर से पड़ेंगे, फ़िर रास्ते मन-माफ़िक मुड़ेंगे हाल से, हालात से, रुठे हुए सवालात से, किसका जिक्र करें? और किस माइका लाल से? घड़ियां चुराते हैं दिन से,  कि चंद लम्हे हाथ आयेंगे आप के हाथ में रख्खे हैं  हाथों से फ़िसल जायेंगे!  आप के हाथ में रखा है हाथ कि संभल जायेंगे, घड़ियां चुराते हैं दिन से,  कब चंद लम्हे हाथ आयेंगे! काबिल हैं मौसम,और हालात भी मेहरबान हैं, कुछ दिन जिंदगी कितनी आसान है, आपके सफ़र में अगर अब भी जान है, याद रहे सारी मुश्किलों को शमशान है! कितने यकीं हैं सामने किसको आसमान करें रास्ते मिल जायेंगे, साथ, कौनसा सामान करें?

काले सच

सुरज की गर्मी से जल कर काले बादल सफ़ेद हो गये, सच के मान्यताओं से मतभेद हो गये हर चीज़ जल कर राख नहीं होती मिट्टी में मिलने से दुनिया खाक नहीं होती सारी शैतानियां लाख नहीं होती लाख कोशिशें दिमाग की, यकीं बिना दिल पर छायी धुँध साफ़ नहीं होती, पेड़ आसमान छू रहे हैं, और पंछी फ़िर भी, लाख कोशिश, दूरियां कम नहीं होती,  अब इसे उड़ान कहें, या  सोच की थकान, आप कहां पहुंचेंगे, कब होंगे, दूरियों के उस ओर, ये इस बात से तय होगा कि  आप अपने रास्तों से चल रहे हैं या अपने रास्तों में पल रहे हैं, तस्वीर आपकी नज़र है, या,  हर अंजाने मोड़ पर आप हाथ मल रहे हैं, प्रक्रिति की दीवारें, कल से,  काल से सीधी खड़ी हैं,  अपने पैरों तले बहती, नदी को छोटा करते,  पर  जब ढहती हैं, तो ऐसे बहती हैं जैसे यही सत्य है, खोना ही होना है, एक अगर आप अब भी खड़े है, क्योंकि घुटनों में बल है, तो सोच लीजिये, क्या ये छल है? जो सच है वो घुटनों के बल है!  (सुरज की आंकाक्षा और बादलों के खुलेपन, विनम्र नदिओं के इरादे और खिसकत...