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निल बटे सन्नाटा!

ज़िंद गी क्या है,  आख़िरकार? कोई वज़ह है? या बस साँसों के चलने की एक जगह है? भय की वजह है? लॉक डाउन, सोशल डिस्टेंसिंग कल के लिए बचने को? हक़ीकत सपने में बदल रहे हैं! क्यों उलटी चाल चल रहे हैं? बच्चे खेलें नहीं? भूखे काम न करें? घर अंदर हिंसा नाकाम न करें? फसल के दाम न करें? मरना कोई नयी बात है? या बस मर्द ज़ज्बात हैं? बीमारी को हराना है? किसी कीमत? तरक्क़ी सदियों की, सभ्यता विकास की, विवेक की, एहसास की, आभास की? निल बट्टे सन्नाटा? घर बैठ जाओ, किसी से मिलो नहीं, सुबह चलो नहीं? अरबों किताबें, लाखों गुणीं बातें, सौ -हज़ार भगवान, फिर भी बात मौत की सब काम तमाम?

विकास विकासम विकासस्यम!

ये दुनिया,  और हम इंसान,  इसका केंद्र,  सब कुछ हमारे इर्द-गिर्द घूमता है,  क्योंकि हमें आगे बढना है,  सबसे आगे,  हर उंचाई पर चढना है, हमसे बेहतर क्या है?  ये कोरोना क्या है? तमाम ज़ंग हैं,  जिनसे लड़ना है,  भूख, पितृसत्ता, घरेलू हिंसा  देह व्यापार, बाल मज़दुर  और हमने क्या चुना है?  नफ़रत, मज़हब,  फ़ूट डालो और राज करो!  अमन-शांति  सब को जगा देगी,  उन सवालों तक पहुँचा देगी,  जो सच की तलाश में हैं! बादल,  हमारा आसमान हैं,  ऐसा हमारा ज्ञान है  जो सामने आ गया  उस को सच करते हैं,  खोज, तलाश, शोध  विज्ञान, सवाल, सुक्ष्म सोच,  ये सब बेकार बातें हैं  हमारे सच, आजकल  व्हाट्सएप पर आते है और हम उसे,  और दस लोगों तक पहुँचाते हैं,  फ़ॉरवडेड एज़ रिसीवड! एक बीमारी के फ़ेल हैं  घर बैठे जेल हैं  तरक्की के ये खेल हैं  एक वाइरस के बेकार हैं इतने हम लाचार हैं  'कुछ नहीं कर सकते'  ये विशेषज्ञों के उपचार हैं  कोविड 19 की व्यापकता  और गु...

नैतिकता के बाज़ार!

इंसान उद्दण्ड हैं, झूठा सब घमंड है, दुनिया पर वर्चस्व का, नैतिकता, सभ्यता, घटिया मज़ाक हैं, बाज़ार का राज है, और सब बिक रहे हैं, मुंहमांगी कीमत मिले तो आप विजेता हैं, सही कीमत, आंखों पर पर्दा है, आप फिर भी सामान हैं! दर्द न हो  इसलिए मर्द हैं? तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, एक्सप्रेस हाइवे,  चमकीले साइनबोर्ड, गगनचुंबी इमारतें,  क्या दिखाते हैं,  लॉकडाउन में  क्या छुपाते हैं,  हैरतअंगेज बात,  लाखों सड़क पर  तब कहाँ जाते हैं? चलते नज़र आते हैं,  जब शहर चलता है! सब कुछ ख़त्म नहीं है, कितनों ने हाथ बढ़ाए हैं, कंधे मिलाए हैं, मजबूरी के दर्द, दर्द की मजबूरी आमने सामने हुए साथ आए हैं, हमदिली है, शुक्र है, सब का, गुज़ारिश एक, सवाल एक साथ रखिए, कल हमें ये सब, कहाँ नज़र आएंगे?

काम तमाम!

आजकल बड़ा आराम है, कहां कोई काम है, न काम की चिंता, न चिंता का काम, वो कोई और हैं, जिनका काम तमाम सब कुछ चलता है, हमेशा से चलता रहा है, वही पुराना ढर्रा, लकीर के फ़क़ीर पीटते लकीर, सांप सूंघ गया है, जिम्मेदार कौन? क्यों शोर जय जय है? किस बात का भय है? सच की क्या जगह है? देश किस को कहते हैं? क्यों लाखों भूखे रहते हैं? बेघर हैं? देश की छोड़िए? अपना सर झुका लेते हैं! शर्म से ! और क्या कहें, भूख सामान बन गयी, सस्ती श्रमिक जान बन गई, रास्ता भूल गई ट्रेन या दिशाहीन सरकार बन गई! कानून कहाँ है ? किसका कानून ? किसके हाथ में है? किसने हाथ लिया है? किस पर चला है ? कमजोर बस हाथ मला है ! निसर्ग आया तूफ़ान की तरह,   और गुजर गया, हमारा कहाँ कुछ किधर गया? फूल बिखरे चादर बन, और किसी का संसार उजड़ गया!

करें तो करें क्या?

करें तो क्या करें? शर्म से मुँह छुपाएं या सिर्फ मास्क करें? भूख प्यास करें, उम्मीद आस करे , ठंडी आह भरें या लंबी सांस करें? सरकार निकम्मी है, कब एहसास करें? शिकवा शिकायत करें, या बस इबादत करें, हाथ जोड़ें या हाथ पर हाथ धरें? चीखें, चिल्लाएं,  भिखारी बनें या जनावर, सिर्फ़ लानत धरें? या गुस्से को धार करें? बच गए किसी तरह, किसी तरह गांव पहुंचे, टूटे हौंसले जोड़ें या छूटा जो सामान करें? कुछ समझ नहीं आया, कोई ख़बर नहीं, कोई मदद नहीं, फिर भी हाथ जोड़ें या सवाल सरकार करें मर गए बीच रस्ते, बेआबरू होकर, उनके पीछे छुटे बच्चे, माँ, बाप  करें तो क्या करें? आपका दिलासा, सहानुभूति, चिंता आग में घी का काम करे! आपने अपने आइनों से कब क्या सवाल करे?

ओ माँ!

"जो बोल नहीं सकते क्या उनको सुन सकते हैं? उनके दर्द को अपने दिल में क्या हम गुन सकते हैं?" ओ माँ और कितने कदम चलना है, छोटा बहुत हूँ और कितने दिन पलना है? ओ माँ ओ माँ तेरी आँखों में जो चमक है, तेरे प्यार में जो नमक है, क्यों फीके पड़ते हैं ओ माँ ओ माँ मैं दौड़ तो जाऊं, पर इतने लंबे रास्ते क्यों हैं, मेरे पैर नाचते क्यों हैं कांपते क्यों है ओ माँ ओ मां तेरा कंधा चुभता है, और सूरज भी, मेरे सर भी गठरी दे दे मैं भी बड़ा हो जाऊं ओ मां भूख बोलूं, प्यास बोलूं, क्या तू है उदास बोलूं तू बोले तो मैं बोलूं चुप हूँ अभी ओ मां

यतीम दर्द!

दर्द ये नहीं के बहुत दर्द है, ये कि दुनिया बड़ी बेदर्द है! मदद करने आ गए हैं सब और हर एक के यही दर्द हैं! अपनी ही जमीन से बेघर बुहार कर निकली गर्द हैं! ऐसी बेरुखी रहनुमाओं की, हमारे जिम्मे ही सारे फ़र्ज़ हैं! निकल पड़े मायूस वापस शहर आपके बड़े सर्द हैं! हिम्मत बड़ी काम आई है, मायुसियों के बड़े कर्ज़ हैं! नहीं समेट पाए जलदी में, छुटे शहर में हमारे दर्द हैं!

ये कैसी सरकार!

आत्मनिर्भर मजदूर    घर से दूर, अपने पैरों चले हैं, सरकारी फैंसले हैं? ये कैसा सरकारी खेल है, कमजोर है वो फेल है? महंगी बड़ी रेल है, सवालों को जेल है? जाको मारे सरकारी नीती,  राख हवा में होई, कदम कदम चल मरेगा,  चाहे मदद जग होई! लोकतंत्र पर लॉकडाउन, ये कैसी सरकार हुई? मजलूमों से आँख फ़ेरती  क्यों ऐसी नाकार हुई? वादे ईरादे हैं क्या?  या सिर्फ़ बातें हैं? नीयत साफ़ नहीं,  एक यही सच बचा है! मज़बूरी को बिसात पर चाल बनाते हैं, बड़े बेगैरत हैं जो सरकार चलाते हैं! सरकार ने अपने को बचा कर रखा है, खुद से ही बस अच्छे दिन का वादा है!! मूरख सी सरकार है,  कुछ कहना बेकार है! भूखे को इज्ज़त नहीं,  हालात-ए-ज़ार है! चलिए कुछ दान करते हैं, ख़ुद को ज़रा महान करते हैं! सवाल पूछने का वक़्त नहीं, सर-आंखों सरकारी फरमान करते हैं!

सब चंगा सी!

लॉकडाउन चालिसी, दोष तब्लीसी, जिम्मेदारी बदलिसी मूरख पब्लिसी! मुसीबत असलिसी मदद नकलिसी, सब चंगा सी! मजदूर पैदलसी भूखे बेहदसी, नफ़रत निकलिसी, बीमारी चीनीसी, टेस्टिंग कछुए सी, सब चंगा सी! लॉकडाउन चालेसी,  चार बार लागेसी लाख पास आलेसी, सरकार जालीसी, या सोई, आलसी, मूँह में गालीसी, वादे लाखों से नीयत जाली सी सब चंगा सी! हाथ फ़ैले सी झोली खाली सी, भुखी प्यासी.   बेटी रुंआसी, हरसू बदहवासी इतनी उदासी,  सब चंगा सी!

ढाई आखर दर्द के!

सुनने वाले बहुत हैं पर किसको कान करें?  ग़रीब हमारे दर्द हैं, कैसे यूँ बरबाद करें?  घर पहुंच जायँगे सोच चलते हैं,  कोई नहीं तो मौत से मिलते हैं!!  दर्द कहाँ हुआ,  आह कहाँ निकली!  सुना कहाँ किस ने,  क्या वजह निकली?  सुनते हैं दर्द अगर तो बहरे कान कीजिए,  कोसों चलते मजलूम आप अंजान कीजिए! रोटियां यतीम हो गयीं भूख के दौर में, दर्द गुमशुदा हैं सारे, तालियों के शोर में!   मौसम बदला है और वक्त ठहरा हुआ है, भूखा है दर्द और बहुत गहरा हुआ है! हर एक कदम दर्द से मुलाकात है, जाने समझें उन्हें कहां ऐसे हालात हैं? सुना है घर बैठे भी आप को दर्द हुआ, बहुत देर टी वी पर हमारा चर्चा हुआ!!

अदने से सच!

ग़रीबी ने चलना शुरू किया रास्ते लुट गई, अकेली थी, बेचारी हो गई, ये कैसी हमको बीमारी हो गई? मजदूर था, घर से दूर था, फ़िर मजबूर हो गया, चलते चलते, खून सारा पानी हो गया, बिन ईद कुर्बानी हो गया! पैर छोटे थे, और रास्ते लंबे हो गए, हड्डियां बोलने लगीं, पैरों के छालों से, पिचके गालों से ये नए खेल! कमजोरी कंधे सवार हो गई, और सारी जमापूंजी, बोझ बन गई, टूटते कंधों में फिर भी उम्मीद है, सपने भी, इज़्ज़त के साथ मरने के! और घर की बात घर में तालाबंद है, सात जनम का संग है, थप्पड़ ओ लात, फ़िर हुई मुलाक़ात नई बोतल के साथ! देशभक्त, अनुशासन युक्त, एक वर्ग, खुश है, इस मुश्किल दौर में सोच मुक्त है, सरकार से कंधा मिलाए, देश चल रहा है, बढ़िया से घर बैठे! रामराज्य!!

चलें, क्या चलता है?

चल रहे हैं, बस! चल रहे हैं, पैरों पर जो गल रहे हैं, बदल रही है दुनिया संभल रही है दुनिया और हम बिखर रहे हैं, टूट रहे हैं, साथ, हाथ छूट रहे हैं! सरकारी फरमान और डंडे उम्मीद लूट रहे हैं, और गरिमा, इज्ज़त! अपनी ही नज़रों से फिसल रहे हैं, भूख की आग में जल रहे हैं और चल रहे हैं  सबके काम, घर बैठे! फ़ैंसले  रोज़ बदल रहे हैं! मर्ज़ी किस की  चल रही है? और मर्ज़  किस को  चला रहा है? मीलों, कोसों,  पहुँच रहे हैं  कितने? मरते,  क्या ने करते क्या किया ? किसी ने? सरकार? समाज? सभ्यता? सब चल रही है,  दुनिया बदल रही है, या नहीं? क्या बताएं,  हम चल रहे हैं, अभी भी, ज़िंदगी की तरफ़ मिल जाए  शायद,  मौत, अपनी गली- गांव, जहां हमारा  नाम हो, अनजान नहीं, पहचान सड़क किनारे, बेचारे, मजदूर, मजबूर माइग्रेंट, बेघर, बेकार, सरकार, और हम एक संख्या! जिसकी गिनती नहीं!

यही होता आया है!

जो जहां है वो वहीं रहेगा! जो होता आया है वो ही होता रहेगा? कहने को लॉकडाउन है! नया क्या है? पुरानी सामाजिक व्यवस्था है! सदियों से, लाखों को किसने छुआ है? या छूने दिया है? मजदुर रास्ते में अटके हैं, यूँ कहिए रास्ते में भटके हैं, अधर में लटके हैं, न घर ने घट के हैं टूट गये जो अभी तक चटके हैं, रोज कमाते थे, कुछ खाते कुछ गंवाते थे, बस्ती में, कौन वसूली को आते थे, कल के भरोसे आज थे, और कल किसने देखा है? आगे की क्या सोचें आज भी, वही लक्ष्मण रेखा है! बीमार हस्पताल में हैं, घेरों में सवाल के हैं, जात क्या है, ध्रम? झुग्गी वाले!! बाप रे! क्या बदल रहा है? बीमारी नहीं, बीमार को दोष है! बीमार अछूत है, और डॉक्टर, नर्स भी! (करो घर खाली) हमारे दिमाग अब भी वर्तमान भूत है! छूत-अछूत है! ज़ाहिर है लोग छुपाते हैं, चुपचाप खामोशी से कोरोना फैलाते हैं! पकड़े न जाएं, विदेश सफर से, बुखार उतार दवाई खा कर आते हैं! क्रोनोलॉजी समझिए, बुखार - टेस्ट - पॉज़िटिव अछूत - अस्पताल सरकारी गंदे टॉयलेट, लांछन, शर्म, दोषःरोपण अपराधबोध समाज में धब्ब...

जितनी लंबी चादर!

आज खाने में आम्रखण्ड रोटी हुई, बेशरम सेहत थोड़ी और मोटी हुई! अंगड़ाई ली और सोचा, किसी की मदद की जाए, धूप से बिटामिन डी ली जाए, पेट भरा हो तो दया अच्छी आती है, भूखे को दिया तो दुआ सच्ची आती है! मजबूर मांगता भी ऐसे जैसे हम भगवान हैं, कानों में मिसरी डाले इतना जो सम्मान है! घर बंगला गाड़ी, सूट साड़ी, इसमें दो चार सौ हज़ार से अपनी ज़ेब को क्या फर्क, चलिए इसी बहाने करें स्वर्ग! वैसे भी हम काफी शरीफ़ हैं अच्छे इंसान, पढ़े लिखे मेहनती, जैसे हमारे बाप और उनके बाप! अब जो बेचारे हैं वो तो बेचारे हैं, अशिक्षा के मारे हैं, इनका क्या करें सदियों से ये गरीब हैं, पहले गाँव के गरीब अब शहर के फ़क़ीर हैं, समाज में ये तो होता है, जब हमारे दादा गांव में मुखिया थे, इनके परदादा उनके सेवक दुखिया थे! बड़े दयालु थे वो, इनके पूरे परिवार को पाला! अब ये लोग शहर आ गए चकाचौंध देखकर, सोचते नहीं हैं ये लोग पैसे के पीछे भागते हैं, पर गरीब की किस्मत देखिए! कौन समझाए, मजदूरी कर के क्या तीर मारेंगे, चलिए, कोई बात नहीं दान धर्म हमार...