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अब क्या करें?

चलो अफ़सोस को जोश करें, सच को समझें ओ होश करें! किसको, कब, क्या दोष करें, अपने ही कोशिशों पर रोष करें! नफ़रत कहाँ नुकसान सोचती है, सोचने की बात है क्या कोष करें? नाउम्मीदी, बेबसी सर उठाएंगी, सोचें उनको कैसे खामोश करें? यकीं हैं जो वोही आसरा बनेंगे, चलिए अपने सच आगोश करें! और बिगड़ेंगे हालात अभी और, 'इससे बुरा क्या' सोच न संतोष करें!

सबका साथ सब पर घात!

ल कह दिया मालिक ने ओ मान जाएं, यूँ बेईमान हमें होना नहीं आता! सवाल वाज़िब हैं सब ओ पुछे जाएंगे? क्यों आपको बेबाक होना नहीं आता? फूलों का दोष कि धागे की गलती? चुभती है सुई या पिरोना नहीं आता!! सब का साथ देने की बात करते हैं, झूठे वो जिनको एक के साथ होना नहीं आता? नीच नीयत है उनकी जो गद्दी बैठे हैं, क़त्लेआम से उसे घबराना नहीं आता! क्या बात करें उस शख़्श के ईमान की खुदनुमाईश से जिसे कतराना नहीं आता! कहता है वो चांद तक ले जाएगा, ओ ठीक से दो सच बताना नहीं आता?