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आग अपनी है!

जलते हैं अपनी आग में तुम क्या हमें जलाओगे, गले लगने तैयार हैं क्या तुम पास आओगे? जल रहे हैं वो भी जो हिम्मत कर के आ गए, राख बन कर कहते हैं, और कितना सताओगे? कुछ यूँ भी कद्रदान हैं जो पानी छिड़कने आ गए! बुझती हुई आग है, क्या अब भी यूँही चाहोगे? आग ख़त्म नहीं होती और राख भी नहीं होते! ज़ख्म पूरे हुए ही नहीं, मलहम जो तुम बनाओगे? हां जी!! राख हो भी गए तो हवा हो जायेंगे चीखती रहें सब ठोकरें के ख़ाक हो जाओगे! वो आग ही है जिसे तुम ज़ख्म कहते हो! जल जाओगे जो यूं रिश्ता निभाओगे!

अपने गिरेबान!

कहां रवि और कहां कवि एक अपनी ही आग में जलता है  , उसे क्या खबर कि  , उसी से जग चलता है ? दुसरा कहने से ड़रता है  , सीधी बात , घूमा - फ़िरा के  , चिंगारी पानी में लपेट के  , प्रवाह के वेग को शब्दॊं में समेट के  , और उम्मीद ये , उसकी आग दुसरों को जलायेगी  , चिंगारी एक दिन आग बनायेगी  ,    और वो अपने अहं की चट्टान चढ खुद की पीठ थपथपा कामयाबी अपने सर लेगा  ``````````````````````````````` और एक तरफ़ सुरज़ जो कल के , दू धदांत वाले गुमनाम बादल को भी गुज़रने देते हैं , चाहे वो उन्का मुंह काला कर के गुजरा हो शर्म से बादल ही पिघल जाते हैं  , और सावन के दिन आते हैं  , उन दिनों की ही  , कितने कवि रोटी खाते हैं और उनमें सुर बिठा  , कितने गले इतराते हैं और उस पर ये दावा  , जहां न पहुंचे रवि , वहां पहुंचे कवि ? मुर्खता या अंहकार  , कवि अंधेरों में अपनी रोटी सेंकते हैं  , चाहे वो खुद के हों , या दुनिया के और रवि अंधेरों को आज़ाद छोड़ता है अपने स...