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बेटी - बचाओ बचाओ!

वो सब राम के बंदे थे, मजबूर थे की नीयत के नंगे थे! परंपराओं के पक्के थे, कुछ अधेड़ थे कुछ उम्र के कच्चे थे, पर इरादों के अपने पक्के थे, दिल थोड़ा नाज़्ज़ुक था, बच्ची पर आ गया, पर फिर भी इरादों से नहीं डगमगाए, बच्ची को मुश्किल न हो, इसलिए दवा भी दिलाए, मारने के बाद भी उसके कपड़े धुलाए, और इस सब में भी पूजा पाठ, भक्ति की पराकाष्ठा कहिए, संतो की वाणी है, अच्छे-बुरे में एक समान, देवस्थान! जय श्री राम! नहीं पड़ेगा जो हनुमान चालीसा, उसका होगा काम तमाम! भारत माता की जय, वंदे मातरम, डर किसका है! (इस्तेमाल किए गए व्यंग चित्र भगवान का अपमान नहीं करते, न ही ऐसी मेरी कोई मंशा है, वो इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि भगवान के नाम का कैसा गलत इस्तेमाल हो रहा है)

जुनैद की टोपी का कत्ल!

बस एक टोपी ही मुसलमान थी, उसके नीचे तो मैं पूरा इंसान था? क्या देखा आपने के मेरा इंसान तो दिखा नहीं, अपनी इंसानियत भी नज़र नहीं आयी? आपके ज़हन ने कैसी मेरी तस्वीर बनाई? वो आपकी आँखों का सुर्ख रंग, मेरा बिखरा हुआ खून कैसे बन गया? क्या बात हुई आपके दिल और दिमाग में? पहली बार कत्ल किया या, है ये आपके मिज़ाज़ में? आप भीड़ थे या  उस नफ़रत की रीढ़ थे? मैं समझ नहीं पाया यूँ पूछता हूँ? मुझे तो आपका इंसान नज़र आया, मैंने हाथ जोड़ कर ये इरादा फ़रमाया, पर माहौल इतना क्यों गरमाया? क्यों इतनों का इरादा भरमाया? क्या आपने नफ़रत पाली है? इतनी फल-फूल कैसे गयी? ये कैसी आँखों में धूल गयी? और आप कहते हैं आपने हाथ नहीं उठाया? और आवाज़? आपकी खामोशी मासूम थी? या डरी हुई? या अपनी ही नज़रों से गिरी हुई? गलत हो रहा है? आपको एहसास था? क्या ख़ाक था? बस एक आख़िरी सवाल है, मैं तो मुसलमान था फिर, मेरे कत्ल से भी "राम नाम सत्य" हुआ क्या? चलिए आपको आपका सच मुबारक हो!

गुस्सा सवालिए!

मैं उदास हुँ हताश नहीं, गुस्सा पाल नहीं रहा, सवाल रहा हूँ, मैं हाल हूँ या हालात? खबरों में खुद से होतीं नहीं मुलाकात, नफ़रत का हर तरफ़ बवाल, कोई मज़हब जल रहा है, और कोई धर्म जला रहा है! जो ज्यादा है वो भीड़ हैं, जो कम हैं वो कम पड़ रहे हैं! इंसान अब इंसानियत से लड़ रहे हैं! और वातानुकूलित सच वालों को यकीन है, के इस दौर में हम आगे बढ़ रहे हैं!