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किसका हाथ है?

किसका हाथ है, किसके साथ है, क्या हो रहा है, ये नहीं, ये की क्या जज़्बात है? आप उम्मीद हैं या सिर्फ हालात हैं? हक़ीकत आग है,  दूर है कहीं, किसी को पास है! वो जुदा है क्या,  जो आपका आकाश है? अनछुआ, अछूता, जो हो रहा है हर ओर, आपको अवकाश है? झाँक रहे हैं सच हर कोने से, क्या नज़र है, तय है आपके होने से! नज़रिया क्या है? वो जो चमकता है या जो स्याह है? वज़ह है क्या ओ क्या सिवाय है? सच के क्या मायने हैं, सच के क्या आईने हैं? जो दिख रहा है वो, या जो टिक गया है वो, मानने को मजबूर हैं, या चलता है क्योंकि दूर हैं?

अंजान तारुफ़

अंजान तारुफ़  सड़क , लोग , मौसम, हवा, हँसी ,  रुकना, चलना, बोलना,  खाना, पीना, छोड़ना ,  ट्रेफिक की बत्ती , रंग बदलती पत्ती ,  यकीन, खुद में, खुदा में , रिश्ते,  नज़दीकी और दूर के,  उम्मीदें , आकांक्षा, आजादी, हाथ की और हकीक़त ,  खुली लाईब्ररी, सहूलियत या तबीयत? रुकती कारें , चलते कदम,  कायदे,  सोच : हमें मालुम है,  सोच या हमें मालुम है_ _ _? सीमित, संकुचित,  दुनिया और भी है, यही होना चाहिये,  सही है? खुश होना चाहिए,  पर तमाम सवाल हैं  मौज़ूद  और मुश्किल  जहाँ सवालियत नहीं है  नज़र एक काफी नहीं है,  तमाम चाहिए,  तारुफ़ अंजान ही बेहतर है,  पहचान चौखटा बना देती है,  शराफत इसी में है,  सच को फैला नहीं सकते  तो भुला दें,  हर लम्हा एक नयी शुरुवात हो, आपसे मिलकर खुशी हुई! आप कौन??????

अतिशुन्य - गतिशुन्य

“Nothing” is perfect अर्थात 'कुछ नहीं' ही पुर्ण है क्योंकि "कुछ नहीं" में कुछ भी नहीं‌ होता कुछ हो तो वो "कुछ नहीं" नहीं होता और, मनुष्य के पास सब कुछ होकर भी कुछ न कुछ नहीं‌ होता शुन्य अपने आप में पुर्ण है उसे बड़ने घटने की आस नहीं इसी कारण शुन्य का गुणा नहीं भाग नहीं पर मनुष्य को है आगे निकलने की होड़ करता है शून्य के साथ भी जोड़ तोड़ पर हमारी दृष्टि शुन्यता देखो हम शुन्य होने का तैयार नहीं उसकी सहभागिता हमें स्वीकार नहीं मनुष्य को अपनी गलतियों का अंहकार है पुर्णता ढूंढता है पर शून्यता से इंकार है छोटे मुंह, बड़ी बात है पर न चाहें तो भी अपने कर्मों पर अपना अधिकार है और प्रदुषण मस्तिष्क का हो या वातावरण का आजकल जो भी हमारा हाल है शुक्र है जाने-अंजाने लगता है हमारा शून्य होने का विचार है