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कौनसे सच?

सच महंगे होंगे तो जरूर बिकेंगे कहिये आप किस बाज़ार टिकेंगे? अकेले सच कोई नहीं लेता,  पहले आप के ही दाम लगायेंगे! आप खबर बस सुनते हैं या चुनते हैं? या सुन कर फिर अपने सच बुनते हैं सच जानने का दौर गया, सच मानने पर सब ज़ोर है! बना बना के सच बेचते है  लाशों पे अपनी रोटी सेंकते हैं बड़े शातिर है शैतान भुखों को मज़हब का चारा फ़ेंकते हैं! कैसे सच अपने आसान करें,  जब सामने झूठ पहलवान करे लाठी ले कर हाथ में कहें,  भैंस का चलना आसान करें! सच का भी मज़हब होता है, जात होती है, गौर कीजे, कोई लाठी उनके हाथ होती है! दिल से मागेंगे तो हर एक दुआ असर होगी, पर ज़रा सच चख के, छूटी कोई कसर होगी! सांच को आंच नहीं, हाथ कंगन को आरसी क्या, ताकत सर चढी तो हिंदी, संस्कृत फ़ारसी क्या? कैसे बनते हैं तमाम सच किस के मन की बात से? तमाम सपने टूटे पड़े हैं, झूठे इरादों को घात से!

फ़रेबी मुश्किल!

टूटे दिल और फ़रेबी मुश्किल कहाँ ले जायेंगे कुछ सच अब आपके थोड़े करीब आयेंगे ! बहुत गुमाँ था आपको उनकी मोहब्बत का अब आपके यकीन आपको आज़मायेंगे ! प्यार , कौन कहता है कि आप छोड़ दें , दूर से देखिये वो अब भी मुस्करायेंगे खुल गयी पोल मोहब्बत की राज़ रखिये , अंदर की बात क्यों चेहरा देवदास रखिये ! दूर के ढोल बड़े सुहाने होते हैं , क्यों पास जा कर दीवाने होते हैं , ड़ंके की चोट पर ज़ोर से ऐलान करते हैं , क्यों मोहब्बत का बाज़ारू सामान करते हैं सारा दोष उनका और सब तोहमतें उन पर कमज़ोर यूँ अपनी मुश्किल आसान करते हैं , 

फ़रेब दिल के!

आईने झूठे हैं या हम मुस्कराते हैं , दिल को कैसे कैसे फ़रेब आते हैं , युँ ही याद कर लेते हैं आपको , यूँ ही आपके करीब आते हैं , मुश्किल नहीं होती आपके जाने की , हम नहीं रोज़ नसीब आज़माते हैं , खामोश आहटें साथ चलती हैं , नहीं दुरियों का शोक मनाते हैं आपकी मोहब्बत के गरीब नहीं ,  फ़कीरी के वो अंदाज़ आते हैं ! न हों तो हर लम्हा बदल जाता है कहां हमको ज़ुदा हिसाब आते हैं ऐसे कोई अकेले कम नहीं पड़ते , पास आये तो दुरियाँ गिनाते हैं बिस्तर को अकेले कम नहीं पड़ते दो हों तो क्यों फ़ासंले गिनाते हैं ? दिल को कैसे कैसे फ़रेब आते है , सपनों में भी हमको आज़माते है