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मोहब्बत के काम!

मोहब्बत क्यों ये मुश्किल काम है? पहलू में उनके सुकूँ, आराम है! क्यों दुनिया में आशिकी बदनाम है? उनकी शिकायत, ये जरूरी काम है! फिक्र है मेरी ये उनका काम है, ये समझ लेना सफर का नाम है! आपस में दोनों खासे बदनाम हैं, आ गया गुस्सा तो खासे आम है! सब शिकायत है मेरी ख़ामोशी से चुप हैं हम और खासे बदनाम हैं! नज़र जब भी नज़रिया बन जाए, समझ लीजे किसी का काम तमाम है! ज़िंदगी जी रही है ख़ूब दोनों को, हम हैं साकी और वो जाम है! मोहब्बत गहरी पहचान है, सुबह मेरी ओ उनकी शाम है! एक-दूजे को मुश्किल-ए-आसान हैं! चैन भी हैं ओ कभी चैन-ओ-हराम हैं!

रिश्ते मैं तो हम आपके.....

रिश्ते ज़ंजीर है किसी को किसी को शमशीर हैं मज़ाक हैं किसी को किसी को पूड़ी खीर हैं किसी को मज़बूर करते हैं किसी को मजदूर किसी को चकनाचूर कोई फलता है,कोई पलता है सही रस्ते चलता है कोई घर से भाग निकलता है कोई इंसाँ से रखता है कोई इंसाँ से बचता है किसी को कुत्ता प्यारा है कोई घोड़े का चारा है कोई फूलों में रमता है कोई उड़ान भरता है बिन रिश्ते इंसान नहीं, जरुरत पर भगवान बनाता है मरे को शमशान बनाता है अपना काम आसान बनाता हैै मतलब का सामान बनाता है बुढ़ापे की लाठी घर की शोभा छाती का बोझा कलाई का धागा मस्त माल मख्खन जैसे गाल बाजारू खरीद दहेज़ के साथ मिली मुफ़्त चीज़ और रिश्ते खून के थाली में मिली नून के जी का जंजाल, खाल के बाल बोले सो सुनो कहे सो बनो, सपने बड़े चुनते हैं छोटे घुनते हैं रिश्ते आज़ाद करते हैं इरादों को बाज़ करते है कामयाबी को ताज करते हैं पीठ को हाथ करते हैं अकेले में बात करते हैं रिश्ते बांधते हैं रोकते हैं हर नए कदम को टोकते हैं पर काटते हैं, आपस में बाँटते हैं रिश्ते झगड़ते हैं, बिगड़ते हैं ...

और आप!

एक आप हैं,  आप दिख रहे हैं या कुछ दिखा रहे हैं,  कहते कुछ नहीं पर कुछ फ़र्मा रहे हैं! आप मुस्कराते हैं या सुबह को जगाते हैं, चलिये आज सूरज़ को भूल जाते हैं :-) नज़र छुपा रहे हैं या बचा रहे हैं , नज़दीकियों के अंदाज़ आ रहे हैं! और एक आप ये भी किसी का सच है, आप भी सचमुच! कितना आसान है, जो किया अगर चुपचुप! जो आप की नज़र में है, वही आज़ की खबर में है, क्या समझें बारीकियों को ध्यान जिनका असर में है! अटके हुए हैं आप अपनी ही तहरीरों में,  रंग दिखते नहीं आप को तस्वीरों में! क्या ये आप नहीं ? आप अपने जख्मों को रंग लगाते रहिये  असर होने के लिये एक आह काफ़ी नहीं! अकेले हैं आप ये सोच छोड़ दीजे, यूँ नज़रों पे इतना भरोसा न कीजे! और आप सब ! रिश्ता कुछ नहीं फ़िर भी वास्ता आप से है, मुसाफ़िर होने की कुछ ये भी तरकीबें हैं! कोशिशें आपकी निशान हो जाये, इरादे आपकी पहचान हो जायें, सफ़र मुबारक है आपका, बस मुश्किलें थोड़ी आसां हो जायें!

इश्क सलामत. . . !

चलो इश्क लड़ाएं ,  अच्छा लड़ाई क्यों,  इश्क रहने दो बस  तुम हो, मैं हूँ, साथ है, कुछ बात है तुम अब भी शर्मा जाती हो, मैं अब भी घबरा जाता हूँ फिर क्यों हम अपनी संवेदना से खेल रहें हैं मैं अब भी कम सुनता हूँ, तुम अब भी देर से उठती हो अब भी तुमारी बिरयानी मेरी चाय है, मुझे अब भी सही करवट लेना नहीं आता तुमको भी कहाँ ठीक से सोना आता मैं नहीं होता तो अब भी तुम MISS करती हो मौका मिल जाए तो, मैं भी पास आकर .... खैर छोड़ो तुम अब भी मुझे मर्द समझती हो मैं अब भी दर्द नहीं समझता अगर कुछ नहीं बदला  तो दर्द क्या है, कौन सी चोट है शायद हमारे देखने में खोट है या कोई पुरानी  चोट है और हम मलहम नहीं बन पा रहे कौन से घाव है जो नज़र नहीं आ रहे अरे . . .  कुछ करवटें हैं कुछ सलवटें बनी नहीं कितनी रातें है अपनी जो बिन गुजरे ही रह गयीं सोचता हूँ. . . कैसे हम बीमार हैं कि आपको बुखार है किसका हो इलाज, किसको ये अजार है सोचें तो. . .  कैसी ये अपने बीच ज़ख्मों कि दीवार है इश्क तुमसे है गर तो क्यों जख्मों से प्य...

नज़दीकियाँ!

नज़दीकियाँ आज़ कल थोड़ी दुर हैं रहती , कुछ आदतें जो इन दिनॊं मज़बूर हैं रहती , अधुरे एहसासॊं के लम्हे इकट्ठे होते हैं बैचेनियाँ ये कुछ रोज़ मसरूफ़ हैं रहती , उनके पास जाने के तमाम रस्ते हैं , ख्वाबॊं में पर कहाँ असल बात है रहती सीधी बात होती नहीं सो कहे देते हैं , कह दिये फ़िर सीधी बात नहीं रहती फ़ांसले नापने से युँ कम नहीं होते , युँ ही अपनी आँखे नम नहीं रहतीं!  

कौनसा दर्द!

कितना दर्द, रीढ़ की हड़्ड़ी से दोस्ती कर, सारे सवालॊं को धमकाता हुआ, दुनिया की रीत की रोटी, खाने को उकसाता हुआ! जो होता आया है वही कहो, जो धागा मिलता है उसी को बुनो जो रास्ता जाना-माना(पुराना) है, उसी को चुनो,  दर्द जैसे कुछ कम था सो, रिश्ते,प्यार, और दोस्ती सब अपना फ़र्ज़ करते हैं, समीकरण कहते हैं, कर्ज़ करते हैं!  शुक्रगुज़ार हुँ, या एहसानमंद? मुंकसिर-मिज़ाजी(humility) मेरे सवालों को तनहा न कर दे,  दर्द और भी हैं शरीर के सिवा, उन सवालों के जो गहरे जाते हैं रुह को चुभते हैं और जिनके नुस्खे नहीं आते,  मेरे रास्तों के शौक ही ऐसे हैं, एक होने को चला हुँ, और अकेला हुँ, सब की नसीहत, जिम्मेदारी! कहते हैं भाग रहा हुँ, क्या अर्ज़ करुं, सदियॊं का सफ़र है, और मैं अभी-अभी जाग रहा हुँ!  (एक सहपाठी के दर्द के साथ एक होने की गरीब कोशिश,जो हाल में रीढ़ पर हुए एक ऑपरेशन से संभल रहा है)

सफ़र-ए-ताल्लुक!

किस मोड़ पर हमसफ़र होंगे,  मैं पहुँचती/ता हूँ,  उम्मीद है आप खड़े होंगे? कितना मुश्किल है बनते हुए रिश्तों की लकीरों पर चलना एहसास को क्यों शरीर चाहिए, क्यों लम्हों के अमीर चाहिए नज़दीक आने कि तमाम मुश्किलें हैं, मोहब्बत को फकीर होना चाहिए समस्या बहने कि नहीं बहते हुए रहने कि, चलो हम बह भी गए तो साहिल क्या होगा गुजरते वक़्त को कायल क्या होगा और रुक गये तो हासिल क्या होगा "इश्क" है जाहिल तेरा क्या होगा दूरियों के सब फर्क मिटा दें तो क्या हाथ आएगा  हांसिल होगा कुछ या होंसला बढ़ जायेगा नजदीक आयेंगे या फ़ासला आ जायेगा एक होँगे या आसरा बढ़ जायेगा पहचान आप से और अपने आप से मेरे हिस्से कि जमीं, और आप कि नजदीकियां मुझे अपने फासले पसंद हैं. नज़दीक होँ  तो आपको नज़र आयें, एक रास्ते भी हैं और सफ़र भी अलग नहीं पर मोड़ आने से पहले कैसे मुड़ जाऊं. जाहिर है मुड़ने का डर नहीं, जरा मुड़ कर भी देखिये मेरे पहुँचने में जरा वक़्त है. इंतज़ार सफ़र को रोकता नहीं शायद, मुश्किल है, पर इंतज...

बिखरे गौहर!

बिखरे गौहर आराम थे फरमाते,  हाथ लगे सुराग, हैं अब नज़र आते   क्यों नापते हो रिश्तों कि लम्बाई क़त्ल तराश होना है, फिर क्यों तलाश हीरे कि तलब बेहतरीन है, तो क्या खाक इबादत पीरे कि मेरे होने में ही इश्क-ए-अज़ीज़ है  फिर क्यों आशुफ़्तगी है कसर ढूँढ कर कहते हो कि कोई कोताही खली है हमारा साथ मुकम्मल है, क्यों ये बात कल है जिन्दगी क्या सिर्फ लम्हों कि फसल है? हमारे साथ कि बेहतर ये आसानी है दुनिया गयी भाड़ में, आपकी हम से सारी परेशानी है  सोच लो हर पल एक लम्हा हो जायेगा गुजरा आँखों से मंजर हो जाएगा, जी लो आज को हर घडी, बीता, कौन जाने कब पिंजर हो जाएगा होंसला साथ हो भी तो, बिना यकीं क्या होगा,  नजर आसमान में सही  पैर जमीं पर होगा देख लो   बिखरे हुए रंग, तस्वीर फिर भी एक है उम्मीद आसमानों कि, इरादे पर भी नेक हैं नजरें चुरा कर नज़र आते हो ... अमां! क्यों अपने हुस्न से कतराते हो कातिल हो या खुद का शिकार,  नजरें बयां कर रही हैं कई अल्फाज़..  ये अंदाज़ है...

अंदाज़ ए नज़र या नज़र अंदाज़ !

कहने को तो जहाँ है, फिर भी ना बाहर आये क्यों.. करीब सारे निशां है, गोया नजर न आये क्यों... खुद पर मुसलसल नजर है, कहे मोहब्बत कोई ... नज़दीक आने का अंजाम, खामियां ही नजर आये क्यों... हमारी शिकायत हमसे ही होती है बारहा... मुश्किल में मुश्किलें है, खुद को आसां बनाए क्यों... यूँ ही नहीं की हमको कोई शिकायत नहीं होती ... जो जख्म नजर नहीं आते उनको भला दिखाएँ क्यों... यूँ तो हमको भी शिकवे हैं छोटी-बड़ी बातों के, यूँ उनको सब मालूम है और हम बतायें क्या! हमारी भी खूबियां हैं  वो कहते बताएं क्या, दिल में दी है जगह अब सर पर बैठायें क्या! रोज किसी न किसी बात पर प्यार आता है, आदत सी पड़ गयी है, अब इसमें‌ बतायें क्या!! इरादे यतीम ना होंगे अज्ञात यकीं की जमीं पर.. बंजारे हों जब मिज़ाज़ के, सफ़र मुकां पर आये क्यों...