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मशकूर मुसाफ़िर

इंसान होने का सफ़र, और उसका असर हर ज़ज्ब करती नज़र से हर मुस्कराहट से खुले दिल और फ़ैली हुई बाँहों से खेल है ये बच्चों का कहने को कुछ नहीं करना ही उनका कहना है, कुछ उम्मीद से मेल खायेंगे हमारे इरादे और हरकतें, ओ' इस के लिए हम मशकूर हैं! We travel to become human and human we become with every glance with every smile with open heart  and welcome arms It is indeed a child’s play for they need not say they show the way believing we may Unite in our intention and action, for that we are grateful

छंद समंदर

साहिल किनारे, समंदर के धारे, सुबह के नज़ारे, रोशन ज़हाँ रे! उम्मीदों के इरादों को कैसे इशारे, यकीनों को सारे नज़ारे सहारे! लहरों के रेतों पर बहते विचारे, लकीरी फकीरों के छूटे सहारे! हर लहर को मिले अलग किनारे, दूजे को देख क्यों हम आप बेचारे ? दूर यूँ उफ़क से समन्दर मिलारे, सपनों को अपने कुछ ऐसे पुकारें! किनारों को समेटे समंदर ज़हाँ रे, किनारों को लगे वो उनके सहारे 

दर्द-सर्द-गर्त!

दर्द हो कर भी नहीं हैं ये लम्हे मेरे साथ हैं पर पास नहीं हैं आस हैं पर आराम नहीं है हलचल तूफान की, पर आहट नहीं है अब किनारो पर राहत नहीं है डूब जाना, जी करता है, पर काफी होगा क्या तैरना आता है, उसका क्या?   सर्द कुछ साँसे, अलग सी आहट भी नहीं करती, एहसास जगा जाती हैं, अनजाने रास्ते, अजनबी क्यों नहीं लगते घबराहटें क्यों मुस्कराती हैं, मेरे इरादे, नक़्शे, मेरे कदम, फिर क्यों नई-सी है धड़कन ये चमक कैसी आँखों मैं है संभावनाएं, सामने न सही, उनकी आहट कानों तक पहुँचती है, खामोश साँसे सुनाई देती हैं, घेर लेती हैं, घर करती हैं, सर्द! गर्त कितनी सतहों तले गर्त के, सच जमे हैं, नज़र कहाँ से आयें? मेरे, तुम्हारे, सबके, क्यों? क्या? अलग अलग हैं? मैं , मेरा, अपना, खुद की,  यकीन, सोच, तजुर्बा, खुश्की, चुस्की, जरूरतें किसकी परिभाषाएँ, उम्मीद, आशाएं कितनी परतें हैं, एक को अनेक करती, साफ़, कुछ भी, कैसे हो? है, धूल, पर सारी कोशिशें महज एक निशान हैं, सतह पर रहते, गुनते, चुनते, बुनते सारे सच कफ़न है, गर्त के!