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जिंदगी साली मौत की घरवाली

हम को ही हम से छीनता है ये ज़िन्दगी का कमीनापन हैं! जिंदगी पर मेरे बड़े एहसान हैं, कैंसर के बदले मुस्कराहटें दी हैं! जीने का और बहुत मन है सिगरेट जैसी बड़ी बुरी लत है! हमें नहीं लड़नी कोई भी लड़ाई जिन्दगी अखाड़ा है ये बात पहले नहीं बतायी! हाँ नहीं तो! मौत कितनी पेटू,कितनी अघोरी है, तमाम ज़िन्दगी सूत के भी भूखी है! ज़िंदगी हाथ धो के पीछे पड़ती है, मौत से मिलीजुली साज़िश लगती है जब देखो बीमारी परस देती है ज़िन्दगी बड़ी बेगैरत मेज़बान है ज़िंदगी मौत के बीच इंसाँ फुटबॉल है, एक ने किक किया दूसरी तरफ गोल है! कहते हैं शरीर बस आत्मा का खोल है, पर मूरख आत्मा क्या जाने, बर्फी चौकोर लड्डू गोल है? कहते हैं आत्मा अमर शरीर नशवर है बेईमान सप्लायर है अगर घटिया घर है? ज़िन्दगी साली मौत की घरवाली निकली, निकला मतलब तो मुँ पलट के चल दी!! (उन जुझारुओं की झुंझलाहट को समर्पित जिन्हें अपनी हिम्मत और लगन केंसर जैसी फ़ालतू बीमारियों से लड़ने और उनके रस्ते अड़ने में लगानी पड़ती है)

नेल्सन मंड़ेला!

मुझ को ढकी हुई रात के परे , छोर से छोर , काली स्याह , शुक्रगुजार , मैं कुदरती ताकत का , अपनी अपराजित रुह के लिये बिगड़े हालात के चंगुल में , मेरे माथे पे शिकन न गले में रुदन मौकों की मार , मेरे सर को लाल कर दी , झुका न सकी , तमाम नाराज़गी और आँसुओं के परे हावी होते हैं पर परछाई के डर , फ़िर भी , इकट्ठे सालों की धमकी , के सामने मैं हूँ और रहूँगा निड़र , नहीं‌ पड़ता फ़रक कि रास्ता कितना तंग है ,  और क्या जारी हुए फ़रमानों के ढंग हैं , मैं ही अपनी किस्मत का विधाता हूँ ,  मैं ही अपनी रुह का ( कार्य ) करता हूँ ! (ये उस कविता को भाषांतरित करने की कोशिश है, जिसकी पंक्तियों‌ ने नेल्सन मंड़ेला को २५ साल जेल में अपने सच के साथ रहने की ताकत दी, अपनी रोज़मर्रा की मुश्किलों या यूँ कहिये अपनी असंभावनाओं को अपने पर हावी न होने देने की कल्पना!)‌