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अपनी ही राख़!

ये कैसा वनवास है, क्यों थक गई मेरी प्यास है? क्यों मुस्कराहट उदास है? अब भी जल रही हूँ, देख, सुन, वो आह जो बदहवास है, छू रहे हैं दर्द अब भी, नहीं जो मेरे खास हैं, महकी हुई है दुनिया जो मेरे आसपास है, चुस्त सारे हवास (senses) हैं, ये कैसी बेदारी (awakening) है, एहसासों की बेगारी है, "मैं" फिर भी मैं हूँ, अपने महलों से सुसज्जित, लज्जित,  अपनी रोशनी से झुंझलाई, जो उन अंधेरों तक  पहुंचते नहीं, जहाँ मेरी नज़र जाती है, किस से मुँह फेरूं, ख़ुद से, या अपने एहसासिया निकम्मेपन से आख़िरकार मैं ही कम हो रही हूं, अपनी ही संवेदना से, जल रही हूँ, जल चुकी हूं? क्या मैं अपनी राख हूँ? अपनी ही रोशनी में जल रहे हैं! राख बन कर अपनी चल रहे हैं!

खेल पास फेल!

कौन हैं ये लोग, चौड़ी तेज़ रफ़्तार सड़कों के फुटपाथ पर, चैन की नींद सोए है? या ज़िंदगी के खोए हैं? देश-समाज की तरक्क़ी से बिछड़े हुए, इंसानियत की परछाई में अनदिखे? क्या इनका कोई आधार है? या इनकी कोई भी बात निराधार है? संसाधन कम नहीं है, कमीं है!! सवालों की, नीयत की, इरादों की, पूरे होते वादों की! आप में है? अपनी जी-तोड़ मेहनत के लाचार, कड़वे सच को सब्र से मीठा करने, सपने देख रहे हैं, मुँह ढक सपनी हक़ीकत को fake रहे हैं! वो सुबह कभी तो आएगी... चौकिदार कौन है ओ चौकीदारी किसकी? चुपचाप खड़ें है, जो मुँह ढके पड़े हैं? बोल नहीं सकते या आवाज़ नहीं है? मजबूरी है, क्या, मंजूरी है? आपकी? मच्छरदानी घर है! उनका? सोचिए! उनको क्या शहर है? फुटपाथ उनकी बस्ती, गली उनका हाइवे, कूड़ादान सुपरमार्केट! इनका देश क्या होगा? वही जो आपका है? और इनकी देशभक्ति? गुस्सा निगल जाना? #ThinkBeforeYouVote

पुकार लो हम अनेक हैं!

अपने भी हैं और इंसान भी, पहचान इतनी काफ़ी है, हाथ बढ़ाने को, कदम मिलाने को, पर ऐसा कहाँ होता है, फिर कहते हो ये देश है, शैतान का एक भेष है, दर्द दर्द नहीं होता, आँसू  आँसू नहीं, पस्त है सब इंसानियत, तराजुओं के सामने! 'अपने' ख़ास होते हैं, दबे कुचले टूटे, इंसानियत की दरारों से लीक हुए, चमत्कार के प्राण नहीं छूटे, पूरे बदन पर शिकन लिए, हम सिर्फ आज नहीं हैं सदियों का कच्चा चिट्ठा हैं, हिम्मत किसमें जो पढ़ ले? "जय भीम" ये पुकार है, के चीख, अज़ान है के कोई पहचान? चाय पर बात है, या बिन शर्त साथ है? एक टॉर्च है, बैटरी की तलाश में, जुड़िए, आप रोशनी हैं! "जय भीम" ये दर्द भी है, खुशी भी, आँसू भी, उल्लास भी, ये एक सपना है, एक कौम का, एक कौम जो इंसान होती, अगर कोई जात, कोई रंग से मानवता हैवान न होती! "जय भीम" एक सवाल है, पूछें खुद से? अपनी बुनियाद से? अपनी हैसियत से? अपनी किस्मत से? अपनी अस्मत से? आपने कमाई है? या हाथों हाथ आई है? जय भारत बोल के देखिए? दो चार आवाज़ साथ देंगी, भीड़ में ज़ज्बात देंगी, दो पल और फिर अप...

सरहदें

सरहदें,  मुल्क की, जात कि, औकात की,  बिना बात की,  पैरों की बेड़ियाँ,  चटखती एड़ियाँ,  सामने समाज की दीवार,  और अंदर यकीन लाचार,    किससे मिलें, क्या सोचें,  तौलें या तुलें,  मुस्करायें या हाथ मिलायें,  मैं अपने दायरों में फ़िर भी बंधा नहीं, उड़ने के लिये मुझे आसमाँ बहुत! कितनी दूरी रक्खें,  कितने नज़दीक आयें,  किसे अजनबी रहें, किससे पहचान बनायें,  गले मिलें! और कहीं‌ गले पड़ जायें? किस ज़ुल्म पे चीखें,  किसे हज़म कर जायें? मस्ज़िद टूटी तो "हे राम" मंदिर को हाथ लगाना हराम? कहाँ खीचें लक्ष्मण रेखायें? सामने घूंघट/ परदा कर के आयें, पर्दे पर आज़ादी,  "बेबी ड़ॉल" वो सोने की,  उसको क्यों कपड़ॅ पहनायें,  रात में ज़लदी घर पर आयें,  कहाँ कहाँ खींचें लक्ष्मण रेखायें? जात बतायें या जात छुपाएं,  सामने इंसान है या बम्मन ?  (माइंड़ मत कीजिये प्लीज़, बम्मन से मतलब है पूरा सवर्ण वर्ग, राजपूत, ठाकुर, २,३,४ वेदी, पाड़े, सक्सेना, माथुर, गुप्ता, कंसल, बैनर्जी, सिन्हा, नैयर, तिलक,...

आँखों का पानी?

आज महिला दिवस है, मुबारक कहते हैं  बराबरी की बात पर, सब नदारद कहते है ! 364 दिन लाचार करते हैं, और फिर एक दिन मुबारकबाद , सच्चाई समेटने को कर दिए कितने दिन बर्बाद कहने को तो और भी महिला दिवस है, ताज़ा खबर है और गरम बहस है!   आज महिला दिवस है, कहते हो तो मान लेते हैं , पर वो हालात कहाँ, कि देखे और जान लेते हैं ! आज महिला दिवस है, शहर में नयी सर्कस है, सट्टा लगा है, सूना है बड़ी ताकतवर बला है ! आज महिला दिवस है,  सुनते हैं संसद में बहस है, अँधेरे कोने में तड़पती, न जाने कितनी बेबस हैं !!  आज महिला दिवस है, क्या कोई बहस है, लार टपकती नहीं शायद, पर वही हवस है ! एक और गुजर गया, सामने क्या बहस का असर गया, खबर बनती रही चौबिसों-सात आँखों से पानी उतर गया!