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अपवादी आवाज़ें

एक और अज़नबी रात सिरहाने खड़ी है, एक और नामुराद दिन मुंह बायें खड़ा है, ना कोई उम्मीद नाउम्मीद हुई है, ना कोई संजीदगी बेगुमां कोई तकलीफ़ अभी तक उदास है, प्यास अभी भी मायुस नही हुई, ना दर्द गुमराह हुए हैं एक हंसी है जो कंहीं अकेली पड़ी है, होँसले बेफ़िकरे खड़े हैं, रास्ते खुद को ही सब्र की दाद देते हैं और मोड़, बेचैनी में बढे हैं, कुलजमां सब वही है, क्या नया हो, जो कुछ गुजरा नहीं है, और क्या पुराना, पहचाने, सब अजनबी हैं कहने को कुछ नहीं है, गालिबन, जो लिखा वो सही है!

भटकते रास्ते

लौट आये अनजान शहर, चंद रोज गुमनाम सहर, कुल ज़मा फिर चार पहर, भटकेंगे मन, जरा ठहर चल मुसाफिर बाकि हैं सफर और इधर, झोली बांधे बांधे ही सराय को घर कर रास्तों के अज़नबी, और अज़नबी के रास्ते, सफ़र अधुरे कितने, चंद मुलाकातो के वास्ते! पलक झपकते ही बुलावा आयेगा, हाथ आये है लम्हा, उसको ही सुकूं कर! बड़ी मेहनत से आराम करते हैं, फुर्सत में हम काम करते हैं नए हालात हैं हर मोड़ पर, हम कहाँ किसी को राम करते हैं यूँ नहीं कि हम बदलते नहीं, पर अपनी चाल चलते हैं, रुकने का वक़्त आया तो चलने का जिकर करते हैं चलते तो सब हैं क्या हर कोई मुसाफिर है? कदम मिलते हों तो क्या हमसफ़र वाज़िब है?