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रास्ते, मुसाफ़िर और कंकड़!

आज हमने एक शहर देखा , उगला हुआ जहर देखा , मुसाफिर बन गुजर गए , हमने कहाँ वो असर देखा कितने रास्ते आज कुछ वीरान हैं ,  मुसाफ़िर तुम आज मेहमान हो , कितने सफ़र उसने कर दिये काबिल , आज समंदर हो गये तुम ओ ' साहिल रस्ते भी हैं और निशान भी ,  यकीं भी है या गुमान ही , नज़र आयेगें खुद को किसी मोड़  पर , बना रखिये पहचान भी . कुछ एक सफ़र , कोई नेक डगर , मासूम असर , मुस्तैद नज़र  कुछ साथ चले , कोई हाथ मिले , कुछ दिल को लगे , ऐसी है खबर ! चलो कुछ ऐसे सफ़र करते हैं , चंद लम्हों कों जिगर करते हैं , उठते रहें कदम यूँही , हम कहाँ  'क्या अंजाम' ये फिकर करते हैं ! कदमों में उम्मीद बंधी है , कोशिशों से रास्ते जुड़े हैं , ज़रा शुरु करिये सफ़र को , यकीन मोड़ पर खड़े हैं ! सफ़र तब्दिली के मुकम्मल नहीं होते ये शौक फ़िर भी जायज़ हैं , दुनिया लगी है सब को उगाने में शुक्र ! सब फ़सल नहीं होते !