ज़िंदगी , जिंदगी , ओ जिंदगी . . . मेरे घर आना .... आना जिंदगी , जिंदगी तमाम रस्ते हैं चलने को , छोटे पड़ते हैं खुद से मिलने को कितने दूर ले जायें अदनी हकीकतें , किस मोड़ मिले अपना आईना आना जिंदगी , मेरे घर आना . . . अपने साथ के सब अकेले हैं , अपनी नज़दीकियों से खेले हैं , रिश्तों का मुश्किल नाम रखा है , क्यूँ नहीं बदलता , बदलता मायना . . . आना जिंदगी , मेरे घर आना . . . रिश्ते लंबाइयों के मोहताज़ नहीं , दो पल का साथ क्या साथ नहीं , चंद लम्हों के लिये जुड़ जायें , करें मुमकिन साथ गुनगुनाना आना जिंदगी , मेरे घर आना . . . टूटी खबरें सारी , क्या जोड़ पायेंगी कब अपनी मुस्कानें हमें रुलायेंगी चलिये अपने यकीन को पालें , पा लें , गुज़ारिश है कहें हमको दीवाना , आना जिंदगी , मेरे घर आना . . .
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।