आज एक शहर देखा, या यूँ कहिये एक युग पिया ज़हर देखा, खोपड़ी फ़िर गयी? ज़ी नहीं, कहीं गिर गयी, अनगिनत पहचानें, गुमशुदा रिश्ते, और एक सपना सब कुछ बराबर करने का, दफ़न सारे सच जो सीढियां बनाते हैं, पीढियाँ, उस ज़हर के साथ चल रही हैं, और कौन जाने किन कोनों में, पल रही हैं, गल रही है, सच्चाईयां लगातार, और नशे में दर्द तलाशते हैं, लोग, है खामोशी, जो सब को बहरा कर दे, और गुँगे, सुनने का अधिकार नहीं रखते वक़्त गुजरा है, लोगों को हाथ मिले हैं, साथ कुछ उम्मीदें, मुमकिन करती सुबह का शाम होना, हिम्मत, हार गयी है मायुसी, निराशा लाचार है, जिंदगी ढर्रे लग गयी है, कुछ आवाजों को छोड़, जो दर्दे से तड़पती हैं, ड़रती नहीं रोशनी को एक सुराख काफ़ी है, न उगे सुरज़, कुछ लोगों को, सुबह गरम करने को, सामने बुझी राख ही काफ़ी हैं! ( कम्पुचिआ के Phnom Penh शहर में किलिंग फ़ील्ड़ और टोल स्लंग/S-21 जेल जो कभी एक स्कुल हुआ करता था देखने के बाद)
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।