सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

साथ लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बस यही बात है!

  साथ है बस यही बात है हां कई जज़्बात है,  जज़्बात काफूर हैं साथ हालात है, साथ है बस यही बात है! साथ है, दिन है, रात है, काम की बात है,  ज़ाहिर मुश्किलात है, मुश्किल कम’उम्र है, साथ सफ़र है, साथ है बस यही बात है! साथ है, मुलाक़ात है, तुमसे तो, खुद से भी, अजनबी फिर भी कई लम्हात हैं, बाक़ी कई बात हैं, सो साथ हैं  बस यही बात है! साथ हैं, सवालात हैं, तमाम जवाबों के, जो अधूरे हैं, जो बदल गये, कुछ फिसल गए, छूटे नहीं हैं, साथ हैं, बस यही बात है!

लाहौर-दस साल पहले

10 साल हुऐ पाकिस्तान गए थे, बनने (थोडा और) इंसान गए थे! बन कर मेहमान गए थे, एक मुश्किल (चार लोग जो बोलते हैं)  को आसान गए थे, जो मिले सब दोस्त हो गए, शक सारे खामोश हो गए! गले मिले आगोश हो गए, जज्बे सब के जोश हो गए! आज वो माहौल नहीं है, दिन, महीना और साल नहीं है, ज़हर का बाज़ार बना है, उसमें कोई इंकलाब नहीं है! हम वही, दोस्त वही हैं, दोस्ती ये खामोश नहीं है, अफ़सोस बहुत है, मिल नहीं पाते, उम्मीदों को यूं सिल नहीं पाते! तैयारी अब भी वही है, इंतजार की प्यास वही है, आस वही है, रास वही है, कोशिश का आकाश वही है! ये दुनिया रास्ते भटक गई है, नाप तोल में अटक गई है, संवेदनाएं मज़हब बन गई, इंसानियत फंदा लटक गई है!!

हमरास्ता!

  दूर आए, नजदीकियों के नज़दीक आ गए, फ़ांसले नहीं हैं फिर भी करीब आ रहे हैं! नज़र को नज़र में नज़र आ रहे हैं, दोनों ही अपने शौक फरमा रहे हैं! मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, और वहीं हैं हम, जहां जा रहे हैं! पहुंचना नहीं है कहीं पर जा रहे हैं, मुश्किल हैं रास्ते पर रास आ रहे हैं! मंजिलों के सौदागर बस बहका रहे हैं, रास्ते कहां जाएंगे, हम कहां जा रहे हैं? हम फकत इन रास्तों से आ जा रहे हैं, यूं धूप–छांव दोनों शौक फरमा रहे हैं! रास्ते ही हमको ठहरा रहे हैं, पूछें  पहुंचना नहीं है तो कहां जा रहे हैं?

दूर के पास!

बिछड़े नहीं पर दूर तो हैं, इन दिनों कुछ मजबूर तो हैं! सिर्फ जरूरत की बात नहीं  एक दूजे को जरूर जो हैं! चौबिसों घन्टे की मुलाकातें  ख़ासे हम मसरूफ जो हैं! उनसे ही हैं बातें सारी कैसे कह दें दूर से हैं? हम कहते वो हूर से हैं, हम उनको लंगूर से हैं! वो ही नाइत्तफाकी हर बात यूँ एक दूजे के मंजूर से हैं! इत ना तज़ुर्बा है एक दूजे का, दूरियों से कहाँ उनसे दूर से हैं? बात करने की गुज़रिशें उनकी हमको कब बोली के शऊर हैं? तसल्ली है सो वो अपनी जगह, नज़दीक और भी पहलू हुज़ूर हैं! होने से मेरे मौसम नहीं बदलते, जरूरत में हवा का झोंका जरूर हैं!

अधूरी बातें!

किस्से बहुत हैं तेरे मेरे अफसानों के, ग़नीमत है के बात अब भी अधूरी है? कहानी पूरी भी नहीं है न अधूरी है, समझ लीजिए कैसी ये मजबूरी है? कोई पूछे ऐसी भी क्या मजबूरी है? ख्वाइशें एक-दूजे से अभी अधूरी हैं! सुबह मेरी है अक्सर रात उनकी है, मर्ज़ीओं को जगह अपनी पूरी है? यूँ तो मान जाएं हर बात उनकी, पर वो कहेंगे ये क्या जीहजूरी है? साथ भी हैं उनके और उनसे दूर भी, आदतों की अपने यूँ कुछ मजबूरी है! गुस्से में भी सारी बात उनसे ही, एक दूसरे के खासे हम धतूरे हैं! अब भी ख़ासा सवाल ही हैं आपस में, आपसी समझ बनने को ये उम्र पूरी है! दोनों के अपने अपने मिज़ाज हैं, साथ कायम होने ये भी जरूरी है! बंजारों वाली तबीयत है, तरबियत भी, और फिर थोड़ा बहकना भी जरूरी है!

सुमित सुमीत!

कथनी से करनी बड़ी, कहे दास कबीर, यूँ प्यार से नफ़रत जीते वो ही सच्चे वीर! वो ही सच्चे वीर कि जो दर्द हो जाएं, आँसू जिनके चोट का मलहम बन जाएं! बने चोट का मलहम चलो ये रीत चलाएं, नफ़रत के मारों के चलो सुमीत बन जाएं! बनें सुमीत सब ऐसे कोई न पड़े अकेला, इस दुनिया को करे बहनचारे का खेला! बहनचारे का खेला नहीं सिर्फ़ ये भाईचारा, शामिल हों इसमें सब, नहीं खासा-प्यारा!  हर कोई खासा-प्यारा यही तो है मानवता, यकीन मानो है हम सब में ये क्षमता! क्षमता कितनी हम सब में ये न पूछो, बुद्ध हुए अपने ही बीच, कबीर सोचो!! (एक इंसान से मुलाकात हुई, बात हुई, इंसानियत पर हुए ज़ख्मों का दर्द उनकी आंखों में नज़र आया, वो भी एक डर होता है जो हाथ आगे बढ़ाता है गले लगाने के लिए, ये बात समझ मे आई)

भूल-चूक, लेनी-देनी!

जो गुज़र गया एक ख्वाब था जो रह गयी एक याद है! जो गुज़र गयी एक आस थी जो रह गयी एक प्यास है! जो कह डाली वो बात है, जो बची वो तन्हा रात है! जो मिल गया एक साथ था जो खो गया वो प्यार है? जो ठहर गया एक पल था जो गुज़र गया वो वक्त है! जो टूट गया एक तार था, जो रह गई एक झंकार है! जो है वोही सब हालात हैं, संभले नहीं वो जज़्बात हैं! तुम हो तो सारी बात है,  जो नहीं तो वोही बात है! जो दब गई वो आवाज़ थी, जो बच गई वो खमोशी है!

हर सफ़र हमसफ़र!

हम सफ़र के हमसफ़र हैं हर सफ़र के वास्ते, हर तरह के हमसफ़र हैं हर सफ़र के वास्ते!! चलना तो शुरू कीजिए, कदम आस्ते, आस्ते, मिल जाएंगे हम जब साथ आएंगे अपने रास्ते! साथ चलते चलते बनेंगे हमसफ़री के रास्ते ये सोच कर चल पड़े हम हमसफ़र के रास्ते! क्या चलें, किस मोड़ मुड़ें, आसां नहीं ये रास्ते हर मोड़ पर मिल जाएंगे हमसफ़र के वास्ते! हमसफ़र से जो सफ़र हैं बस सफ़र के वास्ते, कहाँ जाएं, कब पहुंचें इससे नहीं कोई वास्ते! कहां जाएं, कहां पहुंचे और किस के वास्ते? रास्ते कुछ तन्हा, कुछ हमसफर के साथ के!

मोहब्बत के काम!

मोहब्बत क्यों ये मुश्किल काम है? पहलू में उनके सुकूँ, आराम है! क्यों दुनिया में आशिकी बदनाम है? उनकी शिकायत, ये जरूरी काम है! फिक्र है मेरी ये उनका काम है, ये समझ लेना सफर का नाम है! आपस में दोनों खासे बदनाम हैं, आ गया गुस्सा तो खासे आम है! सब शिकायत है मेरी ख़ामोशी से चुप हैं हम और खासे बदनाम हैं! नज़र जब भी नज़रिया बन जाए, समझ लीजे किसी का काम तमाम है! ज़िंदगी जी रही है ख़ूब दोनों को, हम हैं साकी और वो जाम है! मोहब्बत गहरी पहचान है, सुबह मेरी ओ उनकी शाम है! एक-दूजे को मुश्किल-ए-आसान हैं! चैन भी हैं ओ कभी चैन-ओ-हराम हैं!

खामोश बातें!

मत कहो हमसे, कुछ कहने को, आज बस हमको चुप रहने दो... क्या है कहा नहीं जो, क्या है सुना नहीं जो, क्यों वक़्त को अपने हालात बनाएं, जो है वो भरोसा रहने दो! आज बस हमको चुप रहने दो... कुछ शिकवे हमारे जो कुछ उनकी शिकायतें वो, ये हसींन मुश्किलें क्यों सुलझाएं, जो हैं जज़्बात रहने दो! आज बस हमको चुप रहने दो... सच अपने सपने हैं जो, सपने जो उनके सच हैं! वो ये फ़र्क किस किस को समझाएं? कुछ तो बिन-बात रहने दो आज बस हमको चुप रहने दो... इतने नज़दीक हैं जो, दूरी उतनी हो क्यों, पास से फासलें यूँ नज़र आएं, आपस की बात है रहने दो! आज बस हमको चुप रहने दो!!

कुछ और सफ़र!

a एक और सफर एक और डगर एक और नज़र एक और असर! एक और सुबह, एक और दोपहर, जी भर के किए, फिर कुछ और कसर? ख़ूब नज़ारे, वक्त ख़ूब गुजारे, रह रह के इशारे, क्या है जो पुकारे? बहुत दूर आ गए, कहीं!? बहुत नजदीक आ गए, कहीं!? अगर यही है ज़मीं? फिर क्या है कमीं? क्या छूट नहीं सकता? क्या छोड़ नहीं सकते? क्या जुटा नहीं है अभी? क्या जोड़ नहीं सकते? वो भी हम थे ये भी हम हैं, बहुत ज्यादा थे वहां, यहां थोड़े कम हो गए, फुर्सत से बैठे और हम हो गए!! वहां खुद से शिकायत थी, यहां खुद से गुजारिश है, जो मर्ज़ी है अपनी, वो हो अपनी नवाज़िश है! आगे और भी जाना है? ये कैसा बहाना है? कुछ खो गया है कहीं? या कुछ और गवाना है? हाँ! सफ़र और भी है! डगर और भी हैं, नज़रिया एक यही है, अभी असर और भी हैं, जी तर गया ये सोच, अभी कसर और भी है!!