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गूंजती खामोशियाँ!

सब खामोश हैं कोई सुन नहीं सकता? दर्द सारे मज़हबी रंगों में बिकने लगे हैं! बेख़बर अपने खंजरों से, इतने मासूम हैं सारे दोष शिकार के, ऐसे गुनहगार हैं!  किस किस क़त्ल पर भगवान का नाम है, बस एक मत्था टेका के सौ खून माफ हैं! इतनी चुप्पी है या कान के पर्दे फट गए? इतने घिनौने सच, सब धर्म जात में बंट गए! नफ़रत माफ, झूठ माफ, सरेआम कत्ल माफ़? अपने धर्म की शिक्षा सबको कितनी साफ है! घर बैठे हर एक गुनाह की वकालत करते हैं, आंखों पर पट्टी बांध सब इबादत करते हैं! अपनी कमियों ने कितना कमजोर किया है,  इलाज़ ये कि किस किस को दोष दिया है? यूँ नहीं की शहर के सारे आईने ख़ामोश हैं!  किसके हाथों बिक रहे हैं, ये किसको होश है? ज़ुल्मतों की कमी नहीं, और रोशनी कातिल है, किसको इल्ज़ाम दे के अपने ही सब शामिल हैं! (ज़ुल्मतें - अँधेरे)

अपनी ही राख़!

ये कैसा वनवास है, क्यों थक गई मेरी प्यास है? क्यों मुस्कराहट उदास है? अब भी जल रही हूँ, देख, सुन, वो आह जो बदहवास है, छू रहे हैं दर्द अब भी, नहीं जो मेरे खास हैं, महकी हुई है दुनिया जो मेरे आसपास है, चुस्त सारे हवास (senses) हैं, ये कैसी बेदारी (awakening) है, एहसासों की बेगारी है, "मैं" फिर भी मैं हूँ, अपने महलों से सुसज्जित, लज्जित,  अपनी रोशनी से झुंझलाई, जो उन अंधेरों तक  पहुंचते नहीं, जहाँ मेरी नज़र जाती है, किस से मुँह फेरूं, ख़ुद से, या अपने एहसासिया निकम्मेपन से आख़िरकार मैं ही कम हो रही हूं, अपनी ही संवेदना से, जल रही हूँ, जल चुकी हूं? क्या मैं अपनी राख हूँ? अपनी ही रोशनी में जल रहे हैं! राख बन कर अपनी चल रहे हैं!

त्रिगुण

अनेकता में एकता है?  कौन इतनी फेंकता है?  ...नाम बताओ तो सब सरनेम पूछते हैं! सवर्ण कहाँ संविधान है?  लाखों पांव के छाले पूछते हैं? आप बूझते हैं? भारतीय  साथ दीजिए,  प्यार कीजिए, इज़हार कीजिए!  कहिए क्या सवाल हैं? भलेमानुस घर छोड़ कर आए हैं,  खाली हाथ घर वापस  ये देश के पराए हैं!  मजदूर  बढने की उमर है, पर किधर जाएं?  खाने, खेलने, सोने, बच्चे मालिक ने निकाल दिआ  सरकार ने टाल दिआ,  पुलिस की लाठी, गाली  ताली कोई परेशानी नहीं,  टीवी भगवान है,  बीबी पकवान है!  भक्त मर्द कितने हमदर्द हैं,  कितने साथ आए हैं,  कितने छुट गए, ओझल!

सच आसपास!

हालात, बिगड़े हुए, और  बिगड़ेंगे, टूटे हैं जो, और बिखरेंगे, कमज़ोर चूस कर ताकत बढ़ाते हैं, आपने किस को वोट दिया? था? संस्कृति पुरानी है, गौरवशाली, कड़वे सच रौंद कर, मन की बात, इतिहास, बन रही है, अंधभक्तों की  नई जमात, गर्व से कहो... "जिसकी लाठी उनकी भैंस" बुरा लगता है देश अपना समाज अपना धर्म, जात वर्ग, अपना, अपने द्वारा, अपने लिए, बाकी सब ? पतली गली से निकलिए, गांव, झोपड़-पट्टी, कचरे पर, कचरा जोड़, बेच, पैबंद लगी दीवारों की बस्ती! मेरा भारत महान, मेरा सामान, मेरी दुकान मालिक, सरपरस्त, सेठ, नेता, प्रधान, सर्वेसर्वा कितने नाम, ऊंची दुकान  फीके पकवान, मुसीबत में सब उड़नछू हराम!  हेराम! आपका वोट आपका अंजाम! सच जानेंगे या मनकही मानेंगे? अनकही बातें,  अदृश्य, अनगिने लोगों की, अनचाहे लम्हों की, अनगिनत मुश्किलें, उबलते सवाल, क्या आपको नहीं हैं? जो होता है क्या वो सही है? आपके सवाल कहाँ हैं?

अफ़सोस, ए मुल्क!

खेल पास फेल!

कौन हैं ये लोग, चौड़ी तेज़ रफ़्तार सड़कों के फुटपाथ पर, चैन की नींद सोए है? या ज़िंदगी के खोए हैं? देश-समाज की तरक्क़ी से बिछड़े हुए, इंसानियत की परछाई में अनदिखे? क्या इनका कोई आधार है? या इनकी कोई भी बात निराधार है? संसाधन कम नहीं है, कमीं है!! सवालों की, नीयत की, इरादों की, पूरे होते वादों की! आप में है? अपनी जी-तोड़ मेहनत के लाचार, कड़वे सच को सब्र से मीठा करने, सपने देख रहे हैं, मुँह ढक सपनी हक़ीकत को fake रहे हैं! वो सुबह कभी तो आएगी... चौकिदार कौन है ओ चौकीदारी किसकी? चुपचाप खड़ें है, जो मुँह ढके पड़े हैं? बोल नहीं सकते या आवाज़ नहीं है? मजबूरी है, क्या, मंजूरी है? आपकी? मच्छरदानी घर है! उनका? सोचिए! उनको क्या शहर है? फुटपाथ उनकी बस्ती, गली उनका हाइवे, कूड़ादान सुपरमार्केट! इनका देश क्या होगा? वही जो आपका है? और इनकी देशभक्ति? गुस्सा निगल जाना? #ThinkBeforeYouVote

चार दिन बचपन!

हम भी बच्चे है ! हमारे भी नाम हैं , हम भी खेलते हैं , हाँ ! हमें चीज़ें नहीं लगती खेलने के लिये ! नहीं , नहीं , लगती तो हैं , लकड़ी का टुकडा , मिट्टी का ढेला , जमीन , दीवारें , कभी कभी हम भी कपड़े पहनते हैं , कभी मट्टी से भी काम चला लेते हैं , काम , अपने से छोटे को गोदी उठाना , अब खेल लो , या झेल लो , सच्चाई , जो साथ होती है , साथी नहीं , हम हर रोज़ सीखते हैं , अनुभव से , अभाव से , और अपने पर न होते किसी भी यकीन के प्रभाव से क्लास में पीछे की जगह से , क्यों हमें ही साफ़ करना पड़ता है , शौचालय , उसकी वज़ह से , स्कूल में मास्टर छड़ी से , पर आप क्यों परेशान होते हैं , हम इंसान नहीं हैं , हम एक जात है , मुसहर , मेहतर , ड़ोम , हम गिनती में नहीं आते , फ़िर भी अगर आप जानना चाहते हैं , तो जल्दी करिये , हमारा बचपन छोटा रहता है , और हमारी गोद जल्दी भरती है , आने वाले अगले बचपन से बचपन , और बड़े होने के बीच के मंज़ुर और मज़बूर अपने सचपन से ! (पटना कि धनरुआ ब्लॉक में लालसाचक क्लस्टर में मुस...