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सुबह!

उस मोड़ पर सुबह थी,  उस छोर पर सुबह थी, किसी रात की सुबह थी, कुछ बात है सुबह थी, घनघोर बादल के साथ, या उन्हें छोड़ कर सुबह थी? बावजह थी या बेवजह, सबके साथ ये सुबह थी.. आप कहां हैं, कहां आपकी सुबह थी? जाग रही थी साथ,  या दूर भागती सुबह थी? उस मोड़ पर हम थे, हाथ आयी सुबह थी, मिला रही थी कांधे, एक रास्ता सुबह थी, दिला रही थी यकीन, सहर से शाम सुबह थी, रखी थी पीठ पर हाथ, बड़ी इफरात सुबह थी!

बेवजह सांसे!

  ज़िंदा हूं जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूं, अपनी बेशर्मी में पनाह लिए जा रहा हूं! उम्मीद भी नहीं बची और यकीन भी यतीम है, इस बेबसी को अपनी शमा किए जा रहा हूं! रोशनी भी है और तपिश भी अभी बाकी है, ख़बर नहीं किसको फना किए जा रहा हूं? जाहिर है वो सूरज भी रोशन होगा एक दिन, क्यों हालात को गुमां किए जा रहा हूं? नहीं आना है इस नामाकुल दुनिया में हरगिज़, क्यों फिर इतना पशेमान हुए जा रहा हूं? सिफ़र होने की तमाम कीमतें हैं इस उम्र, क्यों रिश्तों को सामान लिए जा रहा हूं?

बे-औकात

जीने की कोई परवा नहीं है, मरने का कोई शौक नहीं, होश संभाला कब हमने, इस बात का कोई होश नहीं! बड़े बढ़िया बढ़िया लोग यहां, कुछ खास भी कुछ पास भी, पर उनको करने को, अपने  पास तो कोई बात नहीं! हंसना रोना सब होता है, पर फिर भी हम जज़्बात नहीं, बड़े गहरे समंदर हैं सब, अपनी कोई बिसात नहीं! मुश्किलें सब नज़र आती हैं, पर कैसे कहें आराम नहीं, लंबी उमर है अपनी शायद, पर ये तो कोई इल्ज़ाम नहीं? (जी रहा हूं बस, जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूं![जिगर मुरादाबादी] ) कितने लोग नजर आते हैं, जिनकी कायनात नहीं, हाथ पे हाथ धरे बैठे हम, के अपने बस की बात नहीं! कोशिश तमाम ज़ारी हैं, अब इंकलाब की बारी है, कहने को हम शामिल हैं पर अपनी वो औकात नहीं!  उम्मीदें हैं नजरों में पर दिल में हैं मायूसी भी, आस बहुत हैं गरीब की, शायद अब वो प्यास नहीं!

धूप छाँव के खेल!

धूप छाँव के खेल हैं सब, जीते क्या हारे?  नाप-तोल की दुनिया के  हम सब बेचारे! धूप छाँव के खेल हैं सब, किस करवट क्या हो? किस मोड़ मुड़ें, क्या चाल चलें, रुख क्या हो? धूप छाँव के खेल ये सब, अब आप बताएं?  सच के ही सब खेल क्या जुगत बिठाएं?  धूप छाँव के खेल, और हर चीज़ खिलाड़ी,  जो बनता होशियार है बस वही अनाड़ी! धूप छाँव के खेल हैं सब, पलक झपक ले प्यारे!  एकही सच पर टिके जो सब, वो मत के मारे!! धूप छाँव के खेल हैं सब, किस ओर चलें?  क्या संग, किस रंग, किस ढंग कौन मिले? धूप छाँव के खेल हैं सब, किसके हिस्से क्या आए? सवाल ये भी आएगा, 'आप! क्या अपनी जगह बनाए?

अब क्या करें?

चलो अफ़सोस को जोश करें, सच को समझें ओ होश करें! किसको, कब, क्या दोष करें, अपने ही कोशिशों पर रोष करें! नफ़रत कहाँ नुकसान सोचती है, सोचने की बात है क्या कोष करें? नाउम्मीदी, बेबसी सर उठाएंगी, सोचें उनको कैसे खामोश करें? यकीं हैं जो वोही आसरा बनेंगे, चलिए अपने सच आगोश करें! और बिगड़ेंगे हालात अभी और, 'इससे बुरा क्या' सोच न संतोष करें!

अब क्या?

दर्द है बहुत पर अपना ही तो है, टूट गया है वो पर सपना ही तो है! कड़वाहट फैल गयी है हर ओर, लाज़मी उसका चखना ही तो है? अपना नही पराया लगता है अब, क्या गिला मुल्क अपना ही तो है? हाथ खड़े कर दें और बैठ जाएं? उम्मीद को कहीं रखना भी तो है? नफरत से भी इतनी मोहब्बत, कैसे? क्यों दिल किसी का दुखना भी तो है? और ये दौर भी गुज़र जाएगा एक दिन, अभी फ़ूल गुलशन के महकना भी तो है! समझ नहीं पाए हक़ीकत, ये इल्जाम, फंदा तैयार है बस लटकना ही तो है! उम्मीद के बनजारे हैं और कहाँ-कहाँ जाएंगे? उनकी गली एक दिन फिर भटकना भी तो है?

सुबह अनकही!

एक सुबह देखी, जागती, भागती, थकी, कहीं आज़ाद, कहीं बोझे से लदी, उम्मीदें और आस लिए, कहीं भूख और आस लिए, कहीं बनती, सँवरती, जोश और होश लिए, कहीं टूटी, बिखरती, हताश ओ रोष लिए, कहीं खुली, कहीं बंधी लड़खड़ाती कहीं सधी, असीमित विस्तार, कहीं मुट्ठी में लाचार, मुमकिन! न? कहाँ आपकी नजर है? क्या आप पर असर है? क्या आपकी कमाई है? क्या सोच चुन आई है? आपकी नज़र, आपका फैसला है? या ज़हन में, चार गूंजते शोर का घोंसला है? क्या आपके सवाल ज़िंदा हैं? या आप अपनी कोशिशों के शर्मिंदा हैं? आप सुबोह को सुन रहे हैं? या फैंसले आपको चुन रहे हैं? "चार नज़र, चौबीस डगर, मुश्किल हर आसान, ता ऊपर आसमान है, ले तू भी कुछ ठान"

रोशन समंदर!

तमाम अँधेरे, तिनका तिनका रोशन कोने, उम्मीदों को तकिया, इरादों को बिछोने, बस यही है सब कुछ, और जो बाकी है वो आज़ाद मर्ज़ी, फ्री विल, कोशिश और कशिश, हमसफ़र बनते हैं, कभी कोशिश रास्ता, कभी कशिश साहिल, बेबसी ज़ाहिल, सब नज़र है, कहाँ, किसको क्या, असर है, ज़द्दोज़हद जिगर है, और ज़िरह भी, हालात से, खारिज़, आप जी सकते हैं, शर्तों पर, अपनी, जी भर के!

चलो मुस्कानों को बचाये

चलो आज ज़रा इन्साँ हो जायें,   ज़रा दिल को नफ़रत से बचायें! बस हुआ दो और दो का चार करना,  किसी के खून को हिसाब न बनायें, नहीं हो सकती मोहब्बत तुमसे कोई बात नहीं,  गुज़ारिश इतनी कि ज़रा आईने में देख मुस्करायें खून और अश्कों में फ़रक कब खत्म हुआ,  नादानों को नादानी के मायने कौन समझाये? ना कोई खुश होगा न सुकूँमंद ये यकीं है,  हाथ क्या आया ज़रा कोई हमको समझाये! यही आखिरी रास्ता है कैसे यकीं‌ आया? गुस्ताखी माफ़ हो प्लीज़ ज़रा गौर फ़रमायें आज नफ़रत-गुस्सा कितना आसाँ हुआ,  हो सके तो आज उस बाज़ार न जायें दिल पे हाथ रखें और महसूस करें, आज गरज है उम्मीदों की, न गवायें  please please please.....

छान-बीन?

रिश्ते चुनते हैं‌ हम को, कि हम रिश्तों को चुनते हैं, रिश्ते बुनते हैं हम को, कि हम रिश्तों को बुनते हैं! अपने बनते हैं युँ ही, कि युँही बनते हैं अपने हैं, सुनते हैं जो  हम  कहते, या कहते हैं हम सुनते हैं नाम किसका है और क्यों खुद को सामान करते हैं, कुछ खबर है आप को युँ खुद को दुकान करते हैं! नज़र इरादों को जगाती है, उम्मीद अभी बाकी है, युँ छोड़िये फ़िक्र करना तनिक भी, अभी बेबसी काफ़ी है! लंबी उमर है क्या जल्दी है नाउम्मीदगी की,  दो-चार दिन जरा कोशिश के लुत्फ़ ले लो! उम्मीद पलती है गहरे अंधेरे कोनों में, क्या रखा है मुलायम से बिछौनो में! बुरे हालात हैं पर भी मुस्कराते हैं, जानते हैं ये सच ही झूठी बातें हैं! खामोशी सुनती नहीं, आवाज़ों ने बहरा कर दिया, मेरी सोच ने ही, मेरी आज़ादी पर पहरा कर दिया!  वही दिखेगा सामने जो नज़रिया कर लिया आंखें बंद की और अंधेरों को गहरा कर लिया! इरादे सफ़र को निकले हैं, रस्ते इबारत करने,  मुश्किलें हों भी तो रंग तजुर्बों के नफ़ासत करने! इबारत की इज़ाजत है, या की कोई हिमाकत है, अधुरे रह गये सफ़र और बस थो...

गलत गुमानियाँ!

युँ अपने दिल पर नज़र होगी ,  किस आहट से धड़कन असर होगी पास आयेंगे तो पूरी कसर होगी ,  गुजरते लम्हों की रहगुजर होगी! उम्मीद को आसमाँ क्यों बनाएं ,  यकीन को जमीं कीजे कल क्यों पेशानी पर लिखा है , आज सफ़र को हसीं कीजे! हसरतें दर - बदर भटकती हैं ,  नज़रों को क्या दोष कीजे , आदतें सामने सर पटकती हैं , कैसे नये रस्ते जोश कीजे ! सहुलियतें सारी परेशान हैं , क्यों मुश्किलें युँ आसां होती है , दुनियादारी की तमाम सलाहियतें  बस युँ ही नादां होती है! जिन्दगी हाथों में , नज़र आती है , उम्मीद , बातों में नज़र आती है सच्चाई , हंसती खेलती दिखती है , इबादत , इरादों में नज़र आती है! ये साथ मिल कर बनाया है ,  दरो - दीवार अपनी हमसाया हैं काम बहुत, कब तक आगोश में बैठें ,  जतन से ये घोंसला बनाया है!

तलाश, तलाश की!

वो रोशन रात थी या उज़ालॊं की लाश थी बुलंद इमारत, कामयाब इबारत, अंदाज़ जश्न के, और इतनी रोशनी कि सच्चाई जल गयी, ठिठुरती बेबसी अधनंगी सी, कैसे पल गयी, "काश” होती एक जिंदगी, जैसे गड़्ड़ी से फ़िसल गया ताश कोई, बेसब्र नज़र इस आस में‌, कि मिलेगी तलाश कोई, और हम बस चल रहे हैं, एक और शाम, और हम निगल रहे हैं, अंदाज़ भी है, एहसास भी, इरादे भी, फ़िर भी सहारा दे नहीं पाती, तिनका हुँ? पर खुद भी बह रही हुँ, किनारा होने को . . . . क्या नहीं दे दुं! नज़रें बेबस से नहीं मिलीं, पर खुद की बेबसी संभल गयी, एक रास्ता नहीं मिला, पर अपनी सुबह को रोशनी दिखा दी, कैसे कहुँ मज़बुरी थी, मेरी नज़रॊं ने आज़ मेरी उम्मीदें जगा  दीं ! आमीन ! (किसी की एक शाम की चहलकदमी से चुराये हुए ज़ज्बात)

नयी सुगंधें!

मुश्किलें हांसिल हैं उनको, जो सफ़र के काबिल हैं, क्युँ तवज़्ज़ो उन सोचों का जो अभी तक जाहिल हैं! पेशानिओं के बल गिनने को फ़ुर्सतें न हो हांसिल, मुस्करा और करती जा अपने सारे दिन काबिल! मुसरुफ़ियत के दिन सारे, अब तेरे पैमानों में, हो शामिल पहले खुद ही, तु अपने दीवानों में! जिक्र हो तेरा अब, और कई अफ़सानों में, बिक रही है जो किताबें नयी-नयी दुकानों में! ऐसे भी मोड़ गुज़रेंगे, जो कहेंगे काफ़िर है याद रहे फ़क्त इतना, तू एक मुसाफ़िर है! उम्मीद कोई यतीम नही,कहीं सबके ठिकाने हैं, अब नयी सुबहों को तेरी, नये कई आशियाने हैं!

अपने साथ या दूसरों के हाथ

कितने डर हैं, सामने,  उम्मीदें,  कितनी लावारिस कितने यकीन दिल के, मन्नतों से हैं खारिज मेरे रास्तों से क्यों मेरे अपने अजनबी हैं, क्यों नहीं शामिल, मेरे सफर में, खुद से क्या सवाल हों, कल ना कुछ मलाल हो, वो कैसे करीबी हैं, जो दूर करते हैं? वो कैसी मोहब्बत जो इज़ाज़त ही नहीं देती? मैं अपने साथ हूँ,  या दूसरों की बात? क्या समझे है कोई मेरे सच? ये सफर आज़ादी का है? या दूसरों की बेनामी गुलामी में शामिल होने का? मैं खामोश हूँ, रहूँ, बोलूं, बिख्लाऊं, खुलूं, खोलूं, कहूँ कहलाऊं, मैं अपने साथ हूँ, या एक होकर अकेली? पहेली?

लाश की आस!

                                  अब क्या तलाश है तैयार होती एक नयी लाश है वक़्त खामोश है, या इतना कुछ कह रहा कि कुछ हाथ नहीं आता कुछ बदलने वाला है, कुछ पुराना होता है, अतीत जमीं होता है, नया उगता है पर इस लम्हा वो दौरान है कुछ नज़र नहीं आता इस लिए इरादा परेशान है अब जाने दीजिए अगर कोई काश है नया होने को एक नयी लाश है !!

नये अंदाज़!

फिसलते लब्जॊं को थामना पड़ता है, लम्हॊं का यूँ ही शायरी नाम पड़ता है कहाँ जाना है?.. छूने को एहसास करें, चलने को ही प्यास करें, चलो नए अंदाज़ करें, अब सपनो को पास करें नहीं तो .. मुश्किल होने से, मैं कुछ कम नहीं होता,  गमगीन हो साये, पर मैं  rum नहीं होता मुसाफिर होने के मेरे अंदाज़ ऐसे हैं कोई मिले-बिछडे मैं अधुरा कम नहीं होता सुना है ? क्या बात है कि अपने शब्दॊं का मैं साथ नहीं देता ? उन लम्हॊं पर क्या गुजरे जिन्हें मैं रात नहीं देता, आपकी आवाज़ मेरे कहने को अंजाम देती है वर्ना ये शायर अज्ञात को कभी मात नहीं देता! तबज्ज़ो का शुक्रिया, वर्ना हर कोशिश आवाज़ नहीं होती! कोशिश ... कब निकले तेरे अरमान,  की ख्वाइश बन गयी आसमान, इरादॊं  के सफ़र की जरा ऊंची कर उड़ान  क्यॊं परेशां होते है शब्दॊं के पहलवान, शायरी बेहतर अगर, लफ़्ज़ॊं की वर्जिश में आये जान उम्र का काम बड़ना है बड़ेगी, मुश्किल होगी, गर तू लम्हे खर्च करने से डरेगी   तजुर्बे ज़िन्दगी को कहीं पुराना ना कर दें चल आज फिर कुछ नया कर दें!   Embrace al...