सरहदें, मुल्क की, जात कि, औकात की, बिना बात की, पैरों की बेड़ियाँ, चटखती एड़ियाँ, सामने समाज की दीवार, और अंदर यकीन लाचार, किससे मिलें, क्या सोचें, तौलें या तुलें, मुस्करायें या हाथ मिलायें, मैं अपने दायरों में फ़िर भी बंधा नहीं, उड़ने के लिये मुझे आसमाँ बहुत! कितनी दूरी रक्खें, कितने नज़दीक आयें, किसे अजनबी रहें, किससे पहचान बनायें, गले मिलें! और कहीं गले पड़ जायें? किस ज़ुल्म पे चीखें, किसे हज़म कर जायें? मस्ज़िद टूटी तो "हे राम" मंदिर को हाथ लगाना हराम? कहाँ खीचें लक्ष्मण रेखायें? सामने घूंघट/ परदा कर के आयें, पर्दे पर आज़ादी, "बेबी ड़ॉल" वो सोने की, उसको क्यों कपड़ॅ पहनायें, रात में ज़लदी घर पर आयें, कहाँ कहाँ खींचें लक्ष्मण रेखायें? जात बतायें या जात छुपाएं, सामने इंसान है या बम्मन ? (माइंड़ मत कीजिये प्लीज़, बम्मन से मतलब है पूरा सवर्ण वर्ग, राजपूत, ठाकुर, २,३,४ वेदी, पाड़े, सक्सेना, माथुर, गुप्ता, कंसल, बैनर्जी, सिन्हा, नैयर, तिलक,...
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।