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हम तुम

गुम हैं, कभी खुद में, कभी तुम में, कभी हम में, हम हैं, कभी साथ, कभी अकेले, कभी साथ अकेले, तुम हो, कभी साथ, कभी अकेले, कभी तुम, प्यार है,         इश्क भी,           और मोहब्बत इक़रार भी,    कभी अश्क़,        कभी बंदगी तक़रार भी,    कभी रश्क़।        कभी बगावत सरसवार भी,  कभी फ़रहत       दिलअज़ीज़ आदत                            (bliss) गम हैं, ख़ुशी भी, शिकायत भी, शरारत भी ज़ख्म हैं, दवा है, दर्द भी, और दुआ भी नज़दीकी, कभी रूमानी, कभी रूहानी, कभी बेमानी हामी, कभी इनकार, कभी तक़रार, कभी इसरार मानी, कभी मनमानी, कभी बेमानी, कभी नानी😊 दूरी, कभी खुद से, कभी तुमसे, कभी अनबन से रास्ते कभी अपने कभी सपने कभी चखने मोड़, कभी बहकाते कभी बहलाते कभी संभलाते दोनों की अलग फ़ितरत, हर आदत, साथ क़यामत दोनों की एक सोच, साथ की दुनिया हालात की तमाम ताल्लुक़ात की ...

तू हसीं मैं यकीं!

तू हसीं हैं मैं यकीं हूँ, तू ज़मीं है मैं ज़मीं हूँ, ज़रा सा तू, ज़रा सा मैं, इस फलक की ज़र कमी हैं, हमकदम भी, हमनशीं भी, रास्तों के नशेमन लिए, हमनज़र भी, हमसफ़र भी तू असर है, मैं कसर हूँ,  तू खबर ओ मैं ख़ामोशी, मेरे शोर की तू सरगोशी, तू मय भी ओ मयखाना, मैं साकी ओ मैं पैमाना, नाप रहे है अरसों से, एक दूजे को हम रोज़ाना,  पुरे नहीं पड़ते कभी भी, खर्च हुए पर बिन हर्जाना, ज़िक्र आया तो कह देते है, लाखों अफ़साने क्या क्या फ़रमाना, मिल जाएँ गर किसी मोड़ तो, मत कहना की न पहचना!

ज़रा

ज़रा सा उनका मुस्कराना है ज़रा सा हमको पास जाना है ज़रा सी भूल हमसे हो ज़रा सा उनको भूल जाना है! ज़रा सी सख्तियाँ उनकी ज़रा सी नाज़ुक मिज़ाजी, ज़रा से बेशरमियाँ मेरी, ज़रा सी हाज़िर-जवाबी ज़रा से रास्ते दिल के ज़रा सा साथ में चल के ज़रा सी उम्मीदें उनकी ज़रा सी मेरी जिद्दें हैं,  ज़रा सी आवारगी में हम, ज़रा से उनके नखरे हैं, ज़रा है साथ ये हरदम,  ज़रा से फ़िर भी बिखरे है ज़रा से अजनबी हम हैं, ज़रा सो वो हैं पहचाने ज़रा सा दूर से देखें ज़रा करीब कब आएं! ज़रा से हम उनके हैं, जरा से वो हमारे हैं, ज़रा सा बह रहे हैं वो ज़रा सा हम किनारे हैं  ज़रा से ज़ख्म उनके भी ज़रा से दर्द हमारे हैं ज़रा सा इश्क ये ऐसा ज़रा से हम बेचारे हैं ज़रा सा मौसम बेइमान ज़रा सी सफ़र कि थकान ज़रा सा हाथ कंधों पे ज़रा सा काम यूँ आसान

तुम भी न!

मुझको मेरे बारे में बतलाते हो, अब मैं क्या बतलाऊँ, तुम भी ना, कम सुनता हूँ ये बड़ी शिकायत है, फिर भी कितना कह देती हो, तुम भी न, इतने सवाल कहाँ से आ जाते हैं, यूँ तो रग-रग से वाकिफ़ हो, तुम भी न, उम्र हो गयी साथ सफ़र, जो जारी है, फिर भी तनहा हो जाती हो तुम भी न गुस्से से, कभी हार और और कभी प्यार से, अच्छा लगता है पास आती हो, तुम भी न, क्या जिस्मानी, क्या रूमानी या रूहानी, तुम फिर भी तुम ही रहती हो, तुम भी न, पूरी दुनिया अपनी है हर एक इंसाँ, फिर सामने तुम आती हो, तुम भी न! फितरत सब की पकड़ने की फितरत ये, मेरी बात मुझे कहती हो, तुम भी न मौसम बदला, बदलेंगे मिज़ाज़ भी, कम ज्यादा होंगे हम, तुम भी न

जो हम नहीं होते!

चलते हैं उस रस्ते जो खत्म नहीं होते चोट लगती है हमें पर जख्म नहीं होते मरे महबूब की तमाम मुश्किलें  हम से हैं हम से ही कहते हैं काश हम नहीं होते अपनी आदतों से मज़बूर वो अब नहीं होते रात - दिन , शाम - ओ - सहर अब हम नहीं होते नींद में तड़पकर हाथ थाम लेते हैं , ख्वाबों में उनके , क्या हम नहीं होते ? हम में बदलने को रोज़ाना नयी चीज़ें हैं तमाम जरुरत पड़ती है जब उनको हम कम नहीं होते कितनी गर्दिशें‌ झेली हैं तो खुद को समझा है और कोई होता तो बेशक हम नहीं‌ होते ? मतलब निकलता है तब तक साथ सबका है मुश्किलों‌ में‌ तो गोया , हम हम नहीं होते !